कस्यापि प्राणिनो हिंसा नैव कार्याऽत्र मामकै: ।
सूक्ष्मयूकामत्कुणादेरपि बुद्धया कदाचन ।।११।।
My followers shall never knowingly kill any living creature even very small insects like lice, bugs etc. (11)
अब हम उस आचरण की रीति बतलाते हैं कि जो हमारे सत्संगी हैं वे कदापि किसी भी जीव-प्राणिमात्र की हिंसा न करें और जान बूझकर जूँ, खटमल, चांचड आदि सूक्ष्म जीवों की भी हिंसा कभी न करें ।।११।।
देवतापितृयागार्थमप्यजादेश्च हिंसनम् ।
न कर्तव्यमहिंसैव धर्म: प्रोक्तोऽस्ति यन्महान् ।।१२।।
My followers shall never kill animals like goats, deers, rabbits etc. even as offerings in a yagya for deities and ancestors because nonviolence is described as the highest ethic in all scriptures. (12)
और देवयाग तथा पितृयाग के लिए भी बकरे, हिरन, खरगोश, मछली आदि किसी भी जीव की हिंसा न करें, क्योंकि सभी शास्त्रों में अहिंसा को ही परम धर्म कहा गया है ।।१२।।
स्त्रिया धनस्य वा प्राप्त्यै साम्राज्यस्यापि वा क्वचित् ।
मनुष्यस्य तु कस्यापि हिंसा कार्या न सर्वथा ।।१३।।
None shall ever kill any human being in any way even for acquiring women, wealth or kingdom. (13)
और स्त्री, धन तथा राज्यकी प्राप्ति के लिए भी किसी मनुष्य की हिंसा तो किसी भी प्रकार से कदापि न करें ।।१३।।
आत्मघातस्तु तीर्थेऽपि न कर्तव्यश्च न क्रुधा ।
अयोग्याचरणात् क्वापि न विषोद्बन्धनादिना ।।१४।।
Out of anger or out of guilt due to commitment of a sinful act, one shall never commit suicide even at the place of pilgrimage, by means of taking poison or by strangulation or by plunging into a well or by jumping from the hill top. (14)
आत्महत्या तो तीर्थस्थान में भी न करें और क्रोधावेश में भी आत्महत्या न करें, यदि कोई अनुचित आचरण हो जाय तो उससे खिन्न होकर भी आत्मघात न करें तथा जहर खाकर, गले में फंदा डालकर, कुएँ में गिरकर या पर्वत पर से कूदकर, इत्यादि किसी भी प्रकार से आत्महत्या न करें ।।१४।।
न भक्ष्यं सर्वथा मांसं यज्ञशिष्टमपि क्वचित् ।
न पेयं च सुरामद्यमपि देवनिवेदितम् ।।१५।।
Flesh and meat, even if it is remains of a sacrifice in Yagya, should never be eaten even in exigency and any kind of liquor even if it is offered to deities, shall never be drunk. (15)
जो माँस है वह यज्ञ का शेष हो तो भी, आपत्काल में भी कभी न खायें और तीन प्रकार की शराब तथा ग्यारह प्रकार का मद्य देवता का नैवद्य होने पर भी न पीयें ।।१५।।
अकार्याचरणे क्वापि जाते स्वस्य परस्य वा ।
अङ्गच्छेदो न कर्तव्य: शस्त्राद्यैश्च क्रुधापि वा ।।१६।।
Out of anger or as punishment of misdeed committed by oneself or others, one shall never mutilate with a weapon etc. any part of ones body or that of others. (16)
अपने से कुछ अनुचित आचरण हो जाने पर अथवा किसी अन्य से अनुचित आचरण हो जाने पर क्रोधावेश में शस्त्रादि से अपने अंग का तथा दूसरे के अंग का छेदन न करें ।।१६।।
स्तेनकर्म न कर्तव्यं धर्मार्थमपि केनचित् ।
सस्वामिकाष्ठपुष्पादि न ग्राह्यं तदनाज्ञया ।।१७।।
One shall not steal anything even for the religious purpose. Woods, flowers etc. should not be taken without the permission of its owner. (17)
हमारे सत्संगी धार्मिक कार्य के लिए भी कभी चोर का कर्म न करें, तथा दूसरों की मालिकी के काष्ठ पुष्प आदि चीजें भी उनकी (मालिक की) आज्ञा के बिना न लें ।।१७।।
व्यभिचारो न कर्तव्य: पुम्भि: स्त्रीभिश्च मां श्रितै: ।
द्यूतादिव्यसनं त्याज्यं नाद्यं भङ्गादिमादकम् ।।१८।।
My follower males and females shall not commit adultery and they shall refrain from indulging in gambling and similar vices. They shall not consume intoxicating things like hemp, opium, tobacco, snuff etc. in any way. (18)
हमारे आश्रित पुरुष तथा स्त्रियाँ व्यभिचार न करें, जुआ आदि व्यसनों का त्याग करें, भँग, चरस तथा अफीम आदि नशीली चीजों का पान व भक्षण भी न करें ।।१८।।
अग्राह्यान्नेन पक्वं यदन्नं तदुदकं च न ।
जगन्नाथपुरोऽन्यत्र ग्राह्यं कृष्णप्रसाद्यपि ।।१९।।
One shall not accept food or water cooked by or served by a person, who is prohibited by holy scriptures, even if it is the remains of an offering to Bhagwan Shri Krishna except at Jagannathpuri where there is nothing wrong in accepting Prasad of Shri Jagannathji. (19)
और जिसके हाथ से पकाया गया अन्न तथा जिसके पात्र का जल अग्राह्य हो उसका पकाया हुआ अन्न तथा उसके पात्र का जल श्रीकृष्ण भगवान की प्रसादी या चरणामृत के माहात्म्य से भी जगन्नाथपुरी के अलावा अन्य स्थान पर ग्रहण न करें; जगन्नाथपुरी में जगन्नाथजी का प्रसाद लेने में कोई दोष नहीं है ।।१९।।
मिथ्यापवाद: कस्मिंश्चिदपि स्वार्थस्य सिद्धये ।
नारोप्यो नापशब्दाश्च भाषणीया: कदाचन ।।२०।।
None shall ever make false accusation against anyone even for serving self-interest and one shall never abuse anybody. (20)
अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए भी किसी के उपर मिथ्या अपवाद का आरोप न करें तथा किसी को गाली तो कभी न दें ।।२०।।
देवतातीर्थविप्राणां साध्वीनां च सतामपि ।
वेदानां च न कर्तव्या निन्दा श्रव्या न च क्वचित् ।।२१।।
One shall never slander Gods, places of pilgrimage, Brahmins, chaste women, Saints and Vedas nor shall listen to such talks. (21)
और देवता, तीर्थ, ब्राह्मण, पतिव्रता, साधु और वेद इनकी निंदा कदापि न करें तथा न सुनें ।।२१।।
देवतायै भवेद्यस्यै सुरामांसनिवेदनम् ।
यत्पुरोऽजादिहिंसा च न भक्ष्यं तन्निवेदितम् ।।२२।।
None shall eat Prasad of deities to whom liquor and meat are offered or before whom goats and other animals are sacrificed. (22)
जिस देवता के आगे मदिरा तथा माँस का नैवेद्य होता हो तथा जिस देवता के आगे बकरे आदि जीवों की हिंसा होती हो, उस देवता का नैवेद्य न खायें ।।२२।।
द्दष्ट्वा शिवालयादीनि देवागाराणि वर्त्मनि ।
प्रणम्य तानि तद्देवदर्शनं कार्यमादरात् ।।२३।।
Whenever My followers happen to pass by the temples of Bhagwan Shiva or other deities, they shall bow down to them with reverance and have their Darshan. (23)
रास्ते में चलते समय शिवालयादि जो देवमंदिर आवें, उनको देखकर नमस्कार करें और आदरपूर्वक उन देवों का दर्शन करें ।।२३।।
स्ववर्णाश्रमधर्मो य: स हातव्यो न केनचित् ।
परधर्मो न चाचर्यो न च पाषण्डकल्पित: ।।२४।।
One shall neither abandon his duties prescribed as per his own Varna and Ashram nor shall he perform duties prescribed for others. One shall not practice pretentious or fictitious faith. (24)
अपने अपने वर्णाश्रम का जो धर्म, उसका कोई भी सत्संगी त्याग न करें और पर धर्म का आचरण न करें तथा पाखंड धर्मका आचरण न करें तथा कल्पित धर्मका आचरण न करें ।।२४।।
कृष्णभक्ते: स्वधर्माद्वा पतनं यस्य वाक्यत: ।
स्यात्तन्मुखान्न वै श्रव्या: कथावार्ताश्च वा प्रभो: ।।२५।।
One shall not listen to even religious discourses from a person whose preachings might lead one to fall from the devotion of Bhagwan Krishna and from one’s own duty. (25)
जिसके वचन सुनने से श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति और अपना धर्म, इन दोनों में गिरावट होजाय, उसके मुख से भगवान की कथावार्ता न सुनें ।।२५।।
स्वपरद्रोहजननं सत्यं भाष्यं न कर्हिचित् ।
कृतघ्नसङ्गस्त्यक्तव्यो लुञ्चा ग्राह्या न कस्यचित् ।।२६।।
One shall never utter a truth, which may cause betrayal of oneself and others. One shall give up the company of ungrateful persons and shall not accept bribe from anybody. (26)
जिस सत्य वचन बोलने से अपना तथा अन्य का द्रोह हो; ऐसा सत्य वचन कदापि न बोलें और कृतघ्नीके संग का त्याग करें तथा व्यवहारकार्य में किसी से घूस-रिश्वत न लें ।।२६।।
चोरपापिव्यसनिनां सङ्ग: पाखण्डिनां तथा ।
कामिनां च न कर्तव्यो जनवञ्चनकर्मणाम् ।।२७।।
One shall not keep company of thieves, sinners, addicts, hypocrites, promiscuous and alchemists who cheat people by their tricks. (27)
चोर, पापी, व्यसनी, पाखंडी, कामी तथा कीमिया आदि क्रियाओं द्वारा लोगों को ठगनेवाले धूर्त, इन छ प्रकार के मनुष्यों का संग न करें ।।२७।।
भक्तिं वा ज्ञानमालम्ब्य स्त्रीद्रव्यरसलोलुभा: ।
पापे प्रवर्तमाना: स्यु: कार्यस्तेषां न सङ्गम: ।।२८।।
None shall associate with persons who, under the pretext of devotion or knowledge, engage in sinful acts and seek woman, wealth or pleasure of taste. (28)
और जो मनुष्य भक्ति का अथवा ज्ञान का आलंबन लेकर स्त्री, द्रव्य तथा रसास्वाद में अत्यंत लोलुप होकर पाप कर्म में प्रवृत्त हों, ऐसे मनुष्यों का समागम न करें ।।२८।।
कृष्णकृष्णावताराणां खण्डनं यत्र युक्तिभि: ।
कृतं स्यात्तानि शास्त्राणि न मान्यानि कदाचन ।।२९।।
One shall never listen or believe the scriptures in which, Bhagwan Shri Krishna and His incarnations are skillfully refuted. (29)
जिन शास्त्रों में श्रीकृष्ण भगवान तथा श्रीकृष्ण भगवान के वराहादिक अवतारों का युक्तियों द्वारा खण्डन किया गया हो, ऐसे शास्त्रों को कदापि न मानें और न सुनें ।।२९।।
अगालितं न पातव्यं पानीयं च पयस्तथा ।
स्नानादि नैव कर्तव्यं सूक्ष्मजन्तुमयाम्भसा ।।३०।।
None shall drink unfiltered water or milk and none shall use water full of living organisms for bathing etc. (30)
बिना छना हुआ जल तथा दूध न पीयें, तथा जिस जल में अनेक सूक्ष्म जंतु हों, वैसे जल से स्नानादि क्रिया न करें ।।३०।।
यदौषधं च सुरया सम्पृक्तं पललेन वा ।
अज्ञातवृत्तवैद्येन दत्तं चाद्यं न तत् क्वचित् ।।३१।।
My disciples shall never take medicines containing liquor or meat or medicines prescribed by a physician whose conduct and character are not known. (31)
और जो औषध मदिरा या माँस से युक्त हों उसका सेवन कदापि न करें और जिस वैद्य के आचरण को न जानते हो उसका दिया हुआ औषध कभी भी न खायें ।।३१।।
स्थानेषु लोकशास्त्राभ्यां निषिद्धेषु कदाचन ।
मलमूत्रोत्सर्जनं च न कार्यं ष्ठीवनं तथा ।।३२।।
None shall make bodily excretion like passing of urine or motion or even spit at the places like dilapidated temples, banks of river or pond, roads, sown fields, shade of trees, gardens such other places prohibited by scriptures or by the society. (32)
लोक तथा शास्त्रों के द्वारा मलमूत्र करने के लिए वर्जित ऐसे जो स्थान-जीर्ण देवालय, नदी-तालाब के घाट, मार्ग, बोया हुए खेत, वृक्ष की छाया, फूलवारी-बगीचे इत्यादि स्थानों में कदापि मलमूत्र न करें तथा थूके भी नहीं ।।३२।।
अद्वारेण न निर्गम्यं प्रवेष्टव्यं न तेन च ।
स्थाने सस्वामिके वास: कार्योऽपृष्ट्वा न तत्पतिम् ।।३३।।
None shall enter or pass through unauthorized passages and none shall occupy even temporarily any private property without the permission of its owner. (33)
चोर मार्ग से प्रवेश न करें तथा बाहर भी न निकलें तथा मालिकी युक्त स्थान में उसके मालिक से पूछे बिना निवास न करें ।।३३।।
ज्ञानवार्ता श्रुतिर्नार्या मुखात् कार्या न पुरुषै: ।
न विवाद: स्त्रिया कार्यो न राज्ञा न च तज्जनै: ।।३४।।
My male followers shall never listen to religious discourses being delivered by a woman nor shall they argue with a woman, a ruler or his officials. (34)
हमारे सत्संगी पुरुषमात्र, स्त्रियों के मुख से ज्ञानोपदेश न सुनें तथा स्त्रियों के साथ विवाद न करें तथा राजा के साथ एवं राजा के आदमी के साथ कभी विवाद न करें ।।३४।।
अपमानो न कर्तव्यो गुरू णां च वरीयसाम् ।
लोके प्रतिष्ठितानां च विदूषां शस्त्रधारिणाम् ।।३५।।
None shall insult preceptors, superiors and reputed persons, scholars and armed persons. (35)
गुरु, अत्यंत श्रेष्ठ मनुष्य जो समाज में प्रतिष्ठित मनुष्य हो तथा विद्वान एवं शस्त्रधारी मनुष्य हो उनका अपमान न करें ।।३५।।
कार्यं न सहसा किञ्चित्कार्यो धर्मस्तु सत्वरम् ।
पाठनीयाऽधीतविद्या कार्य: सङ्गोऽन्वहं सताम् ।।३६।।
One shall never act under sudden impulse without careful consideration regarding worldly matters but matters relating to Dharma should be done immediately. One should impart the knowledge acquired by him onto others and one shall always keep the company of saints. (36)
विचार किये बिना तत्काल कोई भी व्यावहारिक कार्य न करें और धर्म संबंधी जो कार्य हो उसे तो तत्काल करें तथा स्वयं जो विद्याभ्यास किया हो उसे दूसरों को पढावें तथा प्रतिदिन सन्त समागम करें ।।३६।।
गुरुदेवनृपेक्षार्थं न गम्यं रिक्तपाणिभि: ।
विश्वासघातो नो कार्य:स्वश्लाघा स्वमुखेन च ।।३७।।
None shall approach a preceptor, a deity or a king empty handed and none shall commit a breach of trust of anybody and none shall indulge in self-praise. (37)
गुरु, देव तथा राजा इन तीनों के दर्शनार्थ जाते समय खाली हाथ न जायें। किसी का विश्वासघात न करें और अपने मुख से अपनी प्रशंसा न करें ।।३७।।
यस्मिन् परिहितेऽपि स्युर्द्दश्यान्यङ्गानि चात्मन: ।
तद्दूष्यं वसनं नैव परिधार्यं मदाश्रितै: ।।३८।।
My followers shall not wear such indecent garments, which even after wearing cause any indecent exposure of the body. (38)
जिस वस्त्रको पहनने पर भी अपने शरीर के अंग दिखाई दें ऐसा अभद्र वस्त्र हमारे सत्संगी कभी न पहनें ।।३८।।
धर्मेण रहिता कृष्णभक्ति: कार्या न सर्वथा ।
अज्ञनिन्दाभयान्नैव त्याज्यं श्रीकृष्णसेवनम् ।।३९।।
One shall neither perform the devotion of Bhagwan Shri Krishna devoid of righteousness in any way nor shall give up the worship of Shri Krishna for fear of criticism by ignorant people. (39)
श्रीकृष्ण भगवान की जो भक्ति वह धर्म से रहित कभी न करें और अज्ञानी ऐसे मनुष्यों की निन्दा के भय से श्रीकृष्ण भगवान की सेवा का त्याग न करें ।।३९।।
उत्सवाहेषु नित्यं च कृष्णमन्दिरमागतै: ।
पुम्भि: स्पृश्या न वनितास्तत्र ताभिश्च पूरुषा: ।।४०।।
While being in the temple on a usual day or on the day of festival celebration, My male followers shall not touch females and female followers shall not touch males but outside the temple they may behave as usual. (40)
उत्सव के दिन तथा प्रतिदिन श्रीकृष्ण भगवान के मंदिर में आये हुए सत्संगी पुरुष, मंदिर में स्त्रियों का स्पर्श न करें तथा स्त्रियाँ पुरुषों का स्पर्श न करें। मंदिर से बाहर निकलने के बाद अपनी अपनी रीति अनुसार बर्तें ।।४०।।
कृष्णदीक्षां गुरो: प्राप्तैस्तुलसीमालिके गले ।
धार्ये नित्यं चोर्ध्वपुण्ड्रं ललाटादौ द्विजातिभि: ।।४१।।
All My Brahmin, Kshatriya and Vaishya (‘Dvija’ as they are called in ‘Sanskrit’) followers who are initiated by a Acharya (descendent from the family of Shri Dharmadev) shall always put on around their neck a double ‘Kanthi’ (rosary) of Tulsi beads and shall wear a vertical Tilak mark on their forehead, chest and on both the arms. (41)
धर्मवंशी गुरु से श्रीकृष्ण की दीक्षा प्राप्त की है, ऐसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों वर्णों के हमारे सत्संगी निरंतर गले में तुलसी की दोहरी माला धारण करें तथा ललाट, हृदय एवं दो हाथ-इन चारों स्थान पर ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक करें ।।४१।।
तत्तु गोपीचन्दनेन चन्दनेनाथवा हरे: ।
कार्यं पूजावशिष्टेन केशरादियुतेन च ।।४२।।
This Tilak should be of Gopichandan (i.e. white earth of Dwarika) or with sandal-wood paste mixed with saffron and kumkum consecrated by having been offered to Bhagwan Shri Krishna while performing ‘Puja.’ (42)
और वह तिलक गोपीचन्दन से करें अथवा भगवानकी पूजा करते बाकी बचे केसर-कुंकुमादि से युक्त जो प्रसादी का चन्दन, उससे करें ।।४२।।
तन्मध्य एव कर्तव्य: पुण्ड्रद्रव्येण चन्द्रक: ।
कुङ्कुमेनाथवा वृत्तो राधालक्ष्मीप्रसादिना ।।४३।।
In the middle of that Tilak, a Chandlo (round shaped mark) should be done with Gopichandan or with sanctified kumkum duly offered to Radhikaji or Lakshmiji. (43)
और उस तिलक के मध्यमें ही गोपीचन्दन से अथवा राधिकाजी एवं लक्ष्मीजी के प्रसादीभूत कुंकुम से गोल चन्द्रक करें ।।४३।।
सच्छूद्रा: कृष्णभक्ता ये तैस्तु मालोर्ध्वपुण्ड्रके ।
द्विजातिवद्धारणीये निजधर्मेषु संस्थितै: ।।४४।।
The devotees of Shri Krishna who belong to higher backward classes (i.e. Satshudras) observing their own Dharma shall also wear ‘Tulsi-Mala’ (Kanthi of Tulsi beads) and wear Tilak (religious mark) just like My followers of other three Varnas (i.e. Brahmin, Kshatriya and Vaishya). (44)
अपने धर्म में रहे हुए और श्रीकृष्ण भगवान के भक्त ऐसे जो सत्शूद्र, वे तो तुलसी की माला तथा ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य की तरह धारण करें ।।४४।।
भक्तैस्तदितरैर्माले चन्दनादीन्धनोद्भवे ।
धार्ये कण्ठे ललाटेऽथ कार्य: केवलचन्द्रक: ।।४५।।
The devotees belonging to the castes lower than the Satshudras shall wear around their necks, double Kanthi (rosary) of sandal beads, duly sanctified by offering it to the God and shall wear on their forehead, only a Chandlo without vertical Tilak. (45)
और उन सत्शूद्रों से अतिरिक्त जाति से उतरते ऐसे जो भक्तजन हैं वे भगवान की प्रसादीभूत ऐसे चन्दनादिक काष्ठ की दोहरी माला कंठ में धारण करें तथा ललाट में सिर्फ गोल चन्द्रक करें, परन्तु तिलक न करें ।।४५।।
त्रिपुण्ड्ररुद्राक्षधृतिर्येषां स्यात्स्वकुलागता ।
तैस्तु विप्रादिभि: क्वापि न त्याज्या सा मदाश्रितै: ।।४६।।
Brahmins and others who have been doing Tripund (horizontal Tilak on their forehead) and putting on a rosary of Rudraksha as part of their family traditions shall not abandon this practice even after they become My followers. (46)
जिन ब्राह्मणादिकों को, त्रिपुंड्र करना तथा रुद्राक्ष की माला धारण करना-ये दो बातें अपनी कुल परंपरा से चली आती हों और वे ब्राह्मणादिक हमारे आश्रित बने हों तो भी वे त्रिपुंड्र तथा रुद्राक्ष का कदापि त्याग न करें ।।४६।।
ऐकात्म्यमेव विज्ञेयं नारायणमहेशयो: ।
उभयोर्ब्रह्मरू पेण वेदेषु प्रतिपादनात् ।।४७।।
No distinction shall be made between Narayan and Shiva, as both are proclaimed as Brahmrupa in the Vedas. (47)
नारायण तथा शिवजी-उन दोनों में एकात्मता ही समझें क्योंकि वेदों में उन दोनों का ब्रह्मरुप से प्रतिपादन किया गया है ।।४७।।
शास्त्रोक्त आपद्वर्मो य: स त्वल्पापदि कर्हिचित् ।
मदाश्रितैर्मुख्यतया ग्रहीतव्यो न मानवै: ।।४८।।
In mild exigency My followers shall never resort to relaxations permitted by the scriptures under sheer exigency. (48)
हमारे आश्रित जो मनुष्य, शास्त्र द्वारा प्रतिपादित आपद्धर्म को अल्प आपत्काल में प्रमुख रुप से कदापि ग्रहण न करें ।।४८।।
प्रत्यहं तु प्रबोद्धव्यं पूर्वमेवोदयाद्रवे: ।
विधाय कृष्णस्मरणं कार्य: शौचविधिस्तत: ।।४९।।
My followers shall daily arise before sunrise and after remembering Bhagwan Shri Krishna, they shall proceed for performing physical cleanliness activities. (49)
हमारे आश्रित सत्संगी, प्रतिदिन सूर्योदय के पूर्व ही निद्रा का त्याग करें तथा श्रीकृष्ण भगवान का स्मरण करके शौचविधि करने जायें ।।४९।।
उपविश्यैव चैकत्र कर्तव्यं दन्तधावनम् ।
स्नात्वा शुच्यम्बुना धौते परिधार्ये च वाससी ।।५०।।
Thereafter they shall clean their teeth sitting at one place, take a bath with pure water and then put on a pair of clothes duly washed. (One should be worn around the waist and other should be wrapped on upper parts of the body) (50)
तत्पश्चात् एक स्थान में बैठकर दातुन करें। बाद में पवित्र जल से स्नान करके धोया हुआ एक वस्त्र (धोती) पहने तथा एक उत्तरीय धारण करें ।।५०।।
उपविश्य तत: शुद्ध आसने शुचिभूतले ।
असङ्कीर्ण उपस्पृश्यं प्राङमुखं वोत्तरामुखम् ।।५१।।
Then they shall sit facing east or north on a fair-sized (sufficient to sit comfortably) clean seat (mat) spread over a pure place, untouched by any other seat and shall perform Aachman. (51)
और इसके बाद पवित्र पृथ्वी पर बिछाये हुए, शुद्ध, दूसरे अपवित्र आसन को छूआ न हो तथा जिस पर अच्छी तरह से बैठा जा सके, ऐसे आसन पर पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख बैठकर आचमन करें ।।५१।।
कर्तव्यमूर्ध्व पुण्ड्रं च पुम्भिरेव सचन्द्रकम् ।
कार्य: सधवानारीभिर्भाले कुङकुमचन्द्रक: ।।५२।।
Thereafter all My male disciples shall make vertical Tilak mark with a Chandlo within, on their forehead and all married women followers shall make only a Chandlo with kumkum, on their forehead. (52)
उसके बाद हमारे आश्रित सभी पुरुष, गोल चन्द्रक सहित ऊर्ध्वपुंड्र तिलक करें और जो सधवा हों वे अपने भाल पर कुंकुम का चन्द्रक करें ।।५२।।
पुण्ड्रं वा चन्द्रको भाले न कार्यो मृतनाथया ।
मनसा पूजनं कार्यं तत: कृष्णस्य चाखिलै: ।।५३।।
Widows shall make neither a Tilak nor a Chandlo of kumkum on their forehead. All My followers then shall offer mental worship imagining offerings like sandalwood paste and flowers in mind. (53)
विधवा स्त्री मात्र अपने भाल में तिलक न करें तथा चन्द्रक भी न करें। उसके बाद हमारे सभी सत्संगी मन से कल्पित चंदन, पुष्पादि उपचारों द्वारा श्रीकृष्ण भगवान की मानसी पूजा करें ।।५३।।
प्रणम्य राधाकृष्णस्य लेख्यार्चां तत आदरात् ।
शक्त्या जपित्वा तन्मन्त्रं कर्तव्यं व्यावहारिकम् ।।५४।।
Thereafter they shall reverently have darshan of the image of Radha and Krishna and shall bow down to them. Then, after chanting of Shri Krishna mantra of eight letters according to one’s own capacity, they shall start their daily routines. (54)
इसके बाद श्री राधाकृष्ण की चित्रप्रतिमा का आदरपूर्वक दर्शन करके, नमस्कार करनेके बाद में अपने सामर्थ्य अनुसार श्रीकृष्ण के अष्टाक्षर मंत्र का जप करने के बाद अपना व्यवहारिक कार्य करें ।।५४।।
ये त्वम्बरीषवद्भक्ता: स्युरिहात्मनिवेदिन: ।
तैश्च मानसपूजान्तं कार्यमुक्त क्रमेण वै ।।५५।।
Even those of MY followers, who are Atmanivedi (who have entirely dedicated their lives to the service of God) like king Ambrish shall also perform all the rituals up to mental worship as described above. (55)
और हमारे सत्संगीजनों में अंबरीष राजा के समान जो आत्मनिवेदी उत्तम भक्त हों वे भी पूर्वोक्त क्रमानुसार मानसी पूजापर्यंत सभी क्रिया करें ।।५५।।
शैली वा धातुजा मूर्ति: शालग्रामोऽर्च्य एव तै: ।
द्रव्यैर्यथाप्तै: कृष्णस्य जप्योऽथाष्टाक्षरो मनु: ।।५६।।
These Atmanivedi shall worship the idol of Shri Krishna, made of either stone or metal, or Shaligram (Vishnu) with offerings like sandal paste, flowers, and fruits available and procurable at that time according to one’s own capacity and then they shall chant eight lettered mantra of Shri Krishna. (56)
वे आत्मनिवेदी भक्त पाषाण या धातु से निर्मित श्रीकृष्ण भगवान की प्रतिमा का अथवा शालिग्राम का पूजन, देशकालानुसार यथाशक्ति उपलब्ध चन्दन, पुष्प, फलादि उपहारों से करें और बाद में श्रीकृष्ण भगवान के अष्टाक्षर मंत्र का जप करें ।।५६।।
स्तोत्रादेरथ कृष्णस्य पाठ: कार्य: स्वशक्तित: ।
तथानधीतगीर्वाणै: कार्यं तन्नामकीर्तनम् ।।५७।।
Then they shall recite hymns or read scriptures according to their own capacity. Those who do not know the Sanskrit shall recite songs and holy names of Bhagwan Shri Krishna. (57)
उसके बाद श्रीकृष्ण भगवान के स्तोत्र अथवा ग्रंथ का पाठ अपने सामर्थ्य के अनुसार करें और जो संस्कृत नहीं पढे हैं वे श्रीकृष्ण भगवान का नाम कीर्तन करें ।।५७।।
हरेर्विधाय नैवेद्यं भोज्यं प्रासादिकं तत: ।
कृष्णसेवापरै: प्रीत्या भवितव्यं च तै: सदा ।।५८।।
Then they shall offer food to Bhagwan Shri Krishna and take ‘Prasad’ of the same. They shall thus engage themselves with love in the service of Bhagwan Shri Krishna forever. (58)
तदनन्तर श्रीकृष्ण भगवान को नैवेद्य अर्पण करके प्रसादीभूत अन्न का भोजन करें तथा वे आत्मनिवेदी वैष्णव निरंतर प्रेमपूर्वक श्रीकृष्ण भगवान की सेवा में तत्पर रहें ।।५८।।
प्रोक्तास्ते निर्गुणा भक्ता निर्गुणस्य हरेर्यत: ।
सम्बन्धात्तत्क्रिया: सर्वा भवन्त्येव हि निर्गुणा: ।।५९।।
All the activities of Atmanivedi devotees become Nirguna (Free from three qualities of Maya i.e. Sattva, Rajas and Tamas) because of their constant and intimate association with Bhagwan Shri Krishna, who is forever Nirguna. Therefore all the Atmanivedi devotees are considered as Nirguna. (59)
निर्गुण अर्थात् माया के सत्त्वादिक तीन गुणों से रहित ऐसे जो श्रीकृष्ण भगवान, उनके सम्बन्ध से आत्मनिवेदी भक्तों की सभी क्रियाएँ निर्गुण हो जाती हैं। उसी हेतु से आत्मनिवेदी भक्त निर्गुण कहे गये हैं ।।५९।।
भक्तैरेतैस्तु कृष्णायानर्पितं वार्यपि क्वचित् ।
न पेयं नैव भक्ष्यं च पत्रकन्दफलाद्यपि ।।६०।।
These Atmanivedi devotees shall never drink even water or eat leaves, roots or fruits without first offering the same to Bhagwan Shri Krishna. (60)
ऐसे आत्मनिवेदी भक्त, श्रीकृष्ण भगवान को अर्पण किये बिना जल भी कदापि न पीयें और श्रीकृष्ण भगवान को अर्पण किये बिना पत्र, कंद, फलादि चीजों को कदापि न खायें ।।६०।।
सर्वैरशक्तौ वार्धक्याद् गरीयस्यापदाऽथवा ।
भक्ताय कृष्णमन्यस्मै दत्त्वा वृत्त्यं यथाबलम् ।।६१।।
All my devotees who, due to old age or great exigency, become incapable (to worship) shall entrust the image or idol of Shri Krishna they worship, to other devotees and shall act (worship) according to their ability. (61)
हमारे आश्रित सभी सत्संगी, जब वृद्धावस्था से अथवा किसी भारी आपत्काल के कारण असमर्थ हो जायें तब स्वयं से सेव्यमान जो श्रीकृष्ण का स्वरुप है, उसे अन्य भक्त को सौंपकर स्वयं अपने सामर्थ्य के अनुसार आचरण बर्तें-करें ; ।।६१।।
आचार्येणैव दत्तं यद्यच्च तेन प्रतिष्ठितम् ।
कृष्णस्वरुपं तत्सेव्यं वन्द्यमेवेतरत्तु यत् ।।६२।।
My devotees shall worship only that image or idol of Shri Krishna, which is given by or installed by Acharya (head of the sect) of Shri Dharmadev family. Other images or idols of Shri Krishna are worthy of bow only but not for worship. (62)
धर्मवंश के आचार्य ने ही श्रीकृष्ण का जो स्वरुप सेवा के लिए दिया हो अथवा उस आचार्य ने जिस स्वरुप की प्रतिष्ठा की हो उसी स्वरुप की सेवा करें। इससे अतिरिक्त जो भी श्रीकृष्ण के स्वरुप हैं, वे केवल नमस्कार करने योग्य हैं; परंतु सेवा करने योग्य नहीं हैं ।।६२।।
भगवन्मन्दिरं सर्वै: सायं गन्तव्यमन्वहम् ।
नामसंकीर्तनं कार्यं तत्रोच्चै राधिकापते: ।।६३।।
All My followers shall go to the temple of God every evening and there they shall chant loudly the name of Bhagwan Shri Krishna. (63)
हमारे सभी सत्संगी, हमेशा सायंकाल भगवान के मंदिरमें जायें और वर्हां (मंदिर में) श्री राधिका के पति ऐसे भगवान श्रीकृष्ण के नामों का उच्च स्वर से कीर्तन करें ।।६३।।
कार्यास्तस्य कथावार्ता: श्रव्याश्च परमादरात् ।
वादित्रसहितं कार्यं कृष्णकीर्तनमुत्सवे ।।६४।।
Discourses on the life and teachings of Bhagwan Shri Krishna shall be delivered and listened to with great respect. On the days of festival, my followers shall celebrate by singing songs (kirtans) of Bhagwan Shri Krishna in accompaniment of musical instruments. (64)
और परम आदर से श्रीकृष्ण भगवान की कथा वार्ता करें तथा सुनें। उत्सव के दिन विविध वाद्यों के साथ श्री कृष्ण भगवान का कीर्तन करें ।।६४।।
प्रत्यहं कार्यमित्थं हि सर्वैरपि मदाश्रितै: ।
संस्कृतप्राकृतग्रन्थाभ्यासश्चापि यथामति ।।६५।।
All My devotees shall everyday invariably follow the course laid down above and shall study the religious books in Sanskrit and in vernacular according to their intellectual abilities. (65)
हमारे आश्रित सभी सत्संगी, पूर्व कथनानुसार ही प्रतिदिन आचरण करें और अपनी बुद्धि के अनुसार संस्कृत एवं प्राकृत सद्ग्रन्थों का अध्ययन भी करें ।।६५।।
यादृशैर्यो गुणैर्युक्तस्तादृशे स तु कर्मणि ।
योजनीयो विचार्यैव नान्यथा तु कदाचन ।।६६।।
A person should be entrusted a work, after thoughtfully considering his ability to do that work but never in any other way. (66)
जो मनुष्य जिन गुणों से युक्त हों उस मनुष्य को विचार करके वैसे ही कार्य में प्रेरित करें; परन्तु जिस कार्य के लिए जो योग्य न हो उस कार्य के लिए उसे कदापि प्रेरित न करें ।।६६।।
अन्नवस्त्रादिभि: सर्वे स्वकीया: परिचारका: ।
सम्भावनीया: सततं यथायोग्यं यथाधनम् ।।६७।।
One shall ever take proper care of one’s servants by providing them with food and clothing according to one’s financial capacity. (67)
जो अपने सेवक हों उन सभी की निरन्तर अपने सामर्थ्यानुसार अन्नवस्त्रादि द्वारा यथायोग्य संभावना करें ।।६७।।
याद्दग्गुणो य: पुरुषस्तादृशा वचनेन स: ।
देशकालानुसारेण भाषणीयो न चान्यथा ।।६८।।
A person should be addressed according to his virtues after taking into consideration his status, time and place and not in any other manner. (68)
जो पुरुष जिन गुणों से युक्त हों, उसे वैसे ही वचनों से देशकालानुसार यथायोग्य संबोधित करें परन्तु अन्य रुपसे संबोधित न करें ।।६८।।
गुरुभूपालवर्षिष्ठत्यागिविद्वत्तपस्विनाम् ।
अभ्युत्थानादिना कार्य: सन्मानो विनयान्वितै: ।।६९।।
My courteous disciples, on the arrival of a Guru, a ruler, a very old man, a renounced person, a scholar and an ascetic shall respect him by rising and by offering a seat and by welcoming him with sweet words. (69)
विनयवान हमारे आश्रित सत्संगी-जब गुरु, राजा, अतिवृद्ध, त्यागी, विद्वान तथा तपस्वी ये छ: व्यक्ति पधारें तब सन्मुख उठें तथा आसन अर्पण करें तथा मधुर वाणी से संबोधित करें इत्यादि सभी प्रकार से उनका सन्मान करें ।।६९।।
नोरौ कृत्वा पादमेकं गुरुदेवनृपान्तिके ।
उपवेश्यं सभायां च जानू बद्धवा न वाससा ।।७०।।
One shall not sit with one leg over the other or with knees tied with a piece of cloth, before a preceptor, a deity, a ruler or in a congregation. (70)
गुरु, देव तथा राजा के आगे तथा सभा में पैर पर पैर चढाकर न बैठें और वस्त्र द्वारा घूँटनों को बाँधकर भी न बैठें ।।७०।।
विवादो नैव कर्तव्य: स्वाचार्येण सह क्वचित् ।
पूज्योऽन्नधनवस्त्राद्यैर्यथाशक्ति स चाखिलै: ।।७१।।
All My followers shall never enter into arguments with the Acharya (head of the sect) and shall respectfully serve him by offering food, money and clothes according to their capacity. (71)
हमरे आश्रित सभी सत्संगी, अपने आचार्य के साथ कदापि विवाद न करें और अपनी शक्ति के अनुसार अन्न, धन, वस्त्रादि द्वारा उनकी पूजा करें ।।७१।।
तमायान्तं निशम्याशु प्रत्युद्गन्तव्यमादरात् ।
तस्मिन् यात्यनुगम्यं च ग्रामान्तावधि मच्छ्रितै: ।।७२।।
On hearing about the arrival of the Acharya, My followers shall immediately go forward to receive him with honour and respect. When Acharya departs, they shall accompany him up to the outskirts of the village or town to bid him farewell. (72)
और हमारे आश्रित जो जन हैं वे अपने आचार्य का आगमन सुनकर आदर से उनके सन्मुख जायें और वे जब गाँव से वापस पधारें तब गाँव की सीमा तक विदाई देने जायें ।।७२।।
अपि भूरिफलं कर्म धर्मापेतं भवेद्यदि ।
आचर्यं तर्हि तन्नैव धर्म: सर्वार्थदोऽस्ति हि ।।७३।।
My followers shall never perform any act, even if it is very much rewarding but devoid of Dharma, because only Dharma can fulfil the four purusharthas [i.e. Dharma, Arth, Kama and Moksha]. (73)
जो अधिक फलदायी हो ऐसा कर्म भी यदि धर्मरहित हो तो (उसका) आचरण न करें क्योंकि धर्म ही सभी पुरुषार्थो को देनेवाला है। अत: किसी फलप्राप्ति के लोभ से धर्म का त्याग न करें ।।७३।।
पूर्वैर्महद्भिरपि यदधर्माचरणं क्वचित् ।
कृतं स्यात्तत्तु न ग्राह्यं ग्राह्यो धर्मस्तु तत्कृत: ।।७४।।
None shall follow any unethical act even if it is committed by great persons of the past, only their acts in conformity with the ethical tenets should be followed. (74)
और पूर्वकालीन महापुरुषों ने भी यदि कभी अधर्म का आचरण किया हो तो उसको ग्रहण न करें; किन्तु उन्होंने जो धर्माचरण किया हो उसीको ग्रहण करें ।।७४।।
गुह्यवार्ता तु कस्यापि प्रकाश्या नैव कुत्रचित् ।
समदृष्टया न कार्यश्च यथार्हार्चाव्यतिक्रम: ।।७५।।
One shall never divulge other’s secrets to anyone. One shall be respected for what he duly deserves and under the spirit of equality this principle should not be violated. (75)
किसीकी भी गोपनीय बात कहीं पर भी प्रकाशित न करें और जिसका जैसे सन्मान करना उचित हो उसका वैसे ही सन्मान करें; परन्तु समदृष्टि से इस मर्यादा का उल्लंघन न करें ।।७५।।
विशेषनियमो धार्यश्चातुर्मास्येऽखिलैरपि ।
एकस्मिन् श्रावणे मासि स त्वशक्तैस्तु मानवै: ।।७६।।
All My followers shall undertake additional religious observances during the four months of monsoon (Chaturmaas) and those who are physically weak shall do so during one month of Shravan only. (76)
हमारे सभी सत्संगी, चार्तुमास में विशेष नियम धारण करें और जो असमर्थ हों वे केवल श्रावण मास में ही विशेष नियम धारण करें ।।७६।।
विष्णो: कथाया: श्रवणं वाचनं गुणकीर्तनम् ।
महापूजा मन्त्रजप: स्तोत्रपाठ: प्रदक्षिणा: ।।७७।।
These additional religious observances are: listening to, or reading the sacred discourses on God, singing His glories, performing Mahapuja, mantra chanting, recitation of hymns, circumambulation, and prostration before God. (77)
वे विशेष नियम कौन से हैं, तो भगवान की कथा का श्रवण करना, कथा-वाचन, भगवान के गुणों का कीर्तन करना, पंचामृत स्नानादि द्वारा भगवान की महापूजा करना, भगवान के मंत्र का जप करना, स्तोत्रों का पाठ करना, भगवान की प्रदक्षिणा करना ।।७७।।
साष्टाङ्गप्रणतिश्चेति नियमा उत्तमा मता: ।
एतेष्वेकतमो भक्त्या धारणीयो विशेषत: ।।७८।।
These eight observances are considered as best by Me. My followers shall observe anyone of them with devotion during the four months of monsoon. (78)
तथा भगवान को साष्टांग नमस्कार करना । ये जो आठ प्रकार के नियमों को हमने उत्तम माने हैं, इनमें से किसी भी एक नियम को चातुर्मास में विशेष रुप से भक्तिपूर्वक धारण करें ।।७८।।
एकादशीनां सर्वासां कर्तव्यं व्रतमादरात् ।
कृष्णजन्मदिनानां च शिवरात्रेश्च सोत्सवम् ।।७९।।
All My followers shall observe fast on all Ekadashis, as well as on Janmashtami and Shivratri with reverence and celebrate these days with devotion. (79)
सभी एकादशियों का व्रत तथा श्रीकृष्ण भगवान के जन्माष्टमी आदि जन्मदिन का व्रत आदरपूर्वक करें तथा शिवरात्रि का व्रत आदरपूर्वक करें और उन व्रतों के दिन बडे उत्सव मनावें ।।७९।।
उपवासदिने त्याज्या दिवानिद्रा प्रयत्नत: ।
उपवासस्तया नश्येन्मैथुनेनेव यन्नृणाम् ।।८०।।
On the day of fast My followers shall avoid with great efforts, sleeping during the day because it nullifies the Vrat (vow of austerity) just as sexual act does. (80)
जिस दिन व्रत के निमित्त उपवास किया हो उस दिन प्रयत्नपूर्वक दिवस की निद्रा का त्याग करें क्योंकि जैसे मैथुन द्वारा मनुष्य के उपवास का भंग होता है वैसे ही दिवस की निद्रा से मनुष्य के उपवास का नाश होता है ।।८०।।
सर्व वैष्णव राजश्रीवल्लभाचार्य नन्दन: ।
श्री विठ्ठलेश: कृतवान् यं व्रतोत्सवनिर्णयम् ।।८१।।
Shri Viththalnathji, son of Shri Vallabhacharya, the king of all Vaishnavs has prescribed the days of Vratas and festivals. (81)
सर्व वैष्णवों के राजा ऐसे जो श्री वल्लभाचार्यजी, उनके पुत्र श्री विठ्ठलनाथजी ने जो व्रत एवं उत्सवों का निर्णय किया है ।।८१।।
कार्यास्तमनुसृत्यैव सर्व एव व्रतोत्सवा: ।
सेवारीतिश्च कृष्णस्य ग्राह्या तदुदितैव हि ।।८२।।
My followers shall observe the fasts and festivals as prescribed by Shri Viththalnathji and shall adopt the mode of worship of Bhagwan Shri Krishna as laid down by him. (82)
और उस विठ्ठलनाथजीने किया जो निर्णय उसीके अनुसार ही व्रत एवं उत्सव मनायें और उन्होंने श्रीकृष्ण की जो सेवारीति बताई हैं उसीको ही ग्रहण किया जाय ।।८२।।
कर्तव्या द्वारिकामुख्यतीर्थयात्रा यथाविधि ।
सर्वैरपि यथाशक्ति भाव्यं दीनेषु वत्सलै: ।।८३।।
All My followers shall go on pilgrimage to holy places like Dwarika and others, with due rites and shall always be kind and charitable towards the poor, according to their means. (83)
हमारे सभी आश्रित, द्वारिका आदि तीर्थों की यात्रा अपने सामर्थ्यानुसार यथाविधि करें तथा अपनी शक्ति के अनुसार दीन जनों के प्रति दयावान बनें ।।८३।।
विष्णु: शिवो गणपति: पार्वती च दिवाकर: ।
एता: पूज्यतया मान्या देवता: पञ्च मामकै: ।।८४।।
My followers shall have faith and reverence in five deities viz. Vishnu, Shiv, Ganapati, Parvati and the Sun. (84)
हमारे आश्रित, विष्णु, शिव, गणपति, पार्वती तथा सूर्य इन पाँचों देवों को पूज्यभाव से मानें ।।८४।।
भूताद्युपद्रवे क्वापि वर्म नारायणात्मकम् ।
जप्यं च हनुमन्मन्त्रो जप्यो न क्षुद्रदैवत: ।।८५।।
In the event of any calamity caused by evil spirit like ghosts etc., My followers shall resort to chanting of Narayan Kavacha or Mantra of Hanuman but shall not chant the mantra of others deities of lower strata. (85)
और यदि कभी भूत प्रेतादि का उपद्रव हों तो नारायण कवच का जप करें अथवा हनुमानजी के मंत्र का जप करें; परन्तु इनके सिवा अन्य किसी भी क्षुद्र देवता के स्तोत्र या मंत्र का जप न करें ।।८५।।
रवेरिन्दोश्चोपरागे जायमानेऽपरा: क्रिया: ।
हित्वाशु शुचिभि: सर्वै: कार्य: कृष्णमनोर्जप :।।८६।।
When the solar or lunar eclipse occurs My followers shall leave aside all other activities and after purifying themselves (by means of bath, etc.), they shall chant the mantra of Bhagwan Shri Krishna. (86)
सूर्य एवं चन्द्रका ग्रहण लगने पर हमारे सभी सत्संगी अन्य सभी क्रियाओं को तत्काल छोडकर पवित्र होकर श्रीकृष्ण भगवान के मन्त्र का जप करें ।।८६।।
जातायामथ तन्मुक्तौ कृत्वा स्नानं सचेलकम् ।
देयं दानं गृहिजनै: शक्त्याऽन्यैस्त्वर्च्य ईश्वर: ।।८७।।
When the eclipse is over, all shall take bath with clothes on. The householders shall give charities according to their means and the ascetics shall worship God. (87)
और ग्रहण मोक्ष होने पर वस्त्र सहित स्नान करके जो हमारे गृहस्थ सत्संगी हों, वे अपने सामर्थ्यानुसार दान करें और जो त्यागी हों वे भगवान की पूजा करें ।।८७।।
जन्माशौचं मृताशौचं स्वसम्बन्धानुसारत: ।
पालनीयं यथाशास्त्रं चातुर्वर्ण्य जनैर्मम ।।८८।।
All My followers of four Varnas (i.e. Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra) shall observe ‘Sutak’ (period of impurity during which a person is prohibited to perform religious rites or touch religious things) on the birth or death of a relative as prescribed by the scriptures and according to their relationship with the person born or passed away. (88)
चारों वर्ण के हमारे सत्संगी, वे जन्म तथा मरण के सूतक का अपने अपने सम्बन्ध के अनुसार यथाशास्त्र पालन करें ।।८८।।
भाव्यं शमदमक्षान्तिसन्तोषादिगुणान्वितै: ।
ब्राह्मणै: शौर्यधैर्यादिगुणोपेतैश्च बाहुजै: ।।८९।।
Amongst My followers, Brahmins shall cultivate the qualities like tranquility, self-restraint, forbearance, contentment and such other virtues. The Kshatriyas shall possess bravery, fortitude, and other such qualities. (89)
जो ब्राह्मण वर्ण के हैं, वे शम, दम, क्षमा तथा संतोष आदि गुणों से युक्त हों तथा क्षत्रिय वर्ण के हों, वे शूरवीरता एवं धैर्य आदि गुणों से युक्त हों ।।८९।।
वैश्यैश्च कृषिवाणिज्यकुसीदमुखवृत्तिभि: ।
भवितव्यं तथा शूद्रैर्द्विजसेवादिवृत्तिभि: ।।९०।।
The Vaishyas shall occupy themselves in agriculture, trade, money-lending and alike activities for their livelihood. The Shudras shall employ themselves in serving the other three classes (i.e. Brahmins, Kshatriyas and Vaishyas). (90)
जो वैश्य वर्ण के हैं वे खेती, वाणिज्य-व्यापार तथा महाजनी आदि वृत्तियों से युक्त हों तथा शूद्र वर्ण के हों वे ब्राह्मणादि तीनों वर्णों की सेवा आदि जो वृत्तियों से बर्तें (अपना जीवन यापन करें) ।।९०।।
संस्काराश्चाह्निकं श्राद्धं यथाकालं यथाधनम् ।
स्वस्वगृह्यानुसारेण कर्तव्यं च द्विजन्मभि: ।।९१।।
Those who are Dwija shall perform sacraments, (sixteen sanskars e.g. purifying rites consequents upon conception etc.), the daily rituals and obsequies (offering to the souls of the departed ancestors) at the proper time according to the conventions and within one’s own means. (91)
और जो द्विज हों, वे गर्भाधानादि संस्कार, आह्निक कर्म तथा श्राद्धकर्म, इन तीनोंको अपने-अपने गृह्यसूत्र के अनुसार जैसा जिसका अवसर एवं धनसंपत्ति के अनुसार करें ।।९१।।
अज्ञानाज्ज्ञानतो वाऽपि गुरु वा लघु पातकम् ।
क्वापि स्यात्तर्हि तत्प्रायश्चितं कार्यं स्वशक्तित: ।।९२।।
Whenever a major or minor sin is committed by anybody, knowingly or unknowingly, he shall do expiation for the same according to his capacity. (92)
यदि कभी जाने अथवा अनजाने कोई छोटा या बडा पाप हो जाय तो अपनी शक्ति के अनुसार उसका प्रायश्चित करें ।।९२।।
वेदाश्च व्याससूत्राणि श्रीमद्भागवताभिधम् ।
पुराणं भारते तु श्रीविष्णोर्नामसहस्रकम् ।।९३।।
तथा श्रीभगवद्गीता नीतिश्च विदुरोदिता ।
श्रीवासुदेवमाहात्म्यं स्कान्दवैष्णवखण्डगम् ।।९४।।
धर्मशास्त्रान्तर्गता च याज्ञवल्क्यऋषे: स्मृति: ।
एतान्यष्ट ममेष्टानि सच्छास्त्राणि भवन्ति हि ।।९५।।
(1) The four Vedas, (2) Vyas-Sutras, (3) Shrimad Bhagavat Purana, (4) Vishnu Sahasranam, (5) Shri Bhagavad Gita, (6) Vidur Niti (from Mahabharat), (7) Shri Vasudev Mahatmya from Vishnu-khand of Skand Puran, and (8) Yajnavalkya Smriti — these eight are the most beloved authentic scriptures according to Me. (93–94–95)
चार वेद, व्याससूत्र, श्रीमद् भागवतपुराण, महाभारत में स्थित श्रीविष्णुसहस्त्रनाम स्तोत्र ।।९३।।
भगवद् गीता, विदुरनीति, स्कंदपुराण के विष्णुखंड में रहा हुआ श्रीवासुदेव माहात्म्य ।।९४।।
और धर्मशास्त्रों के अन्तर्गत याज्ञवल्क्य ऋषि की स्मृति, ये आठ सच्छास्त्र हमें इष्ट हैं ।।९५।।
स्वहितेच्छुभिरेतानि मच्छिष्यै: सकलैरपि ।
श्रोतव्यान्यथ पाठ्यानि कथनीयानि च द्विजै: ।।९६।।
All My disciples desirous of their own welfare shall listen to these scriptures, and My Brahmin followers shall study, preach, and deliver discourses on them. (96)
अपना हित चाहनेवाले हमारे सभी शिष्य, उन आठ सच्छास्त्रों को सुनें और हमारे आश्रित जो द्विज हैं, वे उन सच्छास्त्रों को पढ़ें, पढ़ावें और उनकी कथा करें ।।९६।।
तत्राचारव्यवहृतिनिष्कृतानां च निर्णये ।
ग्राह्या मिताक्षरोपेता याज्ञवल्क्यस्य तु स्मृति: ।।९७।।
Out of these eight scriptures, Yagnyavalkya Smruti with its commentary named ‘Mitakshara’ shall be treated as authority for arriving at decisions on customs, mutual dealings, and expiation. (97)
उन आठ सच्छास्त्रों में से आचार, व्यवहार तथा प्रायश्चित इन तीनों के निर्णय के लिए मिताक्षर टीकायुक्त याज्ञवल्क्य ऋषि की स्मृति को ग्रहण करें ।।९७।।
श्रीमद्भागवतस्यैषु स्कन्धौ दशमपञ्चमौ ।
सर्वाधिकतया ज्ञेयौ कृष्णमाहात्म्यबुद्धये ।।९८।।
The fifth and the tenth Skandas (cantos) of Shreemad Bhagawat Purana should be considered as supreme to realise the glory and greatness of Bhagwan Shri Krishna. (98)
और उन आठ सच्छास्त्रों में जो श्रीमद् भागवत पुराण है, उसके दशम तथा पंचम, इन दो स्कंधों को श्रीकृष्ण भगवान का माहात्म्य जानने के लिए सबसे अधिक रूप से जानें ।।९८।।
दशम: पञ्चम: स्कन्धो याज्ञवल्क्यस्य च स्मृति: ।
भक्तिशास्त्रं योगशास्त्रं धर्मशास्त्रं क्रमेण मे ।।९९।।
The tenth skanda (canto) of Shreemad Bhagawat Puran, the fifth skanda of the same, and Yagnyavalkya Smruti are My Bhakti Shastra (Scripture of Devotion), Yog Shastra (Scripture of Yoga), and Dharma Shastra (Scripture of Religion) respectively. (99)
दशमस्कंध, पंचमस्कंध, तथा याज्ञवल्क्य ऋषिकी स्मृति, ये तीनों क्रमश: हमारे भक्तिशास्त्र, योगशास्त्र एवं धर्मशास्त्र हैं। अर्थात् दशमस्कंध भक्तिशास्त्र है, पंचमस्कंध योगशास्त्र है तथा याज्ञवल्क्य ऋषिकी स्मृति धर्मशास्त्र है ऐसा जानें ।।९९।।
शारीरकाणां भगवद्गीतायाश्चावगम्यताम् ।
रामानुजाचार्यकृतं भाष्यमाध्यात्मिकं मम ।।१००।।
The commentaries on both Vyas-sutras and Shri Bhagavad Gita by Ramanujacharya shall be treated as My favourite scriptures on spirituality. (100)
और श्रीरामानुजाचार्य द्वारा किया हुआ व्याससूत्र का श्रीभाष्य तथा श्रीभगवद् गीता का भाष्य—ये दोनों हमारे अध्यात्मशास्त्र हैं ऐसा जानें ।।१००।।
एतेषु यानि वाक्यानि श्रीकृष्णस्य वृषस्य च ।
अत्युत्कर्षपराणि स्युस्तथा भक्तिविरागयो: ।।१०१।।
शास्त्रेष्वेतेषु येऽर्था ह्यन्यैर्वा निगमादिभि: ।
प्रमाणैरविरोधेन तान्ग्राह्यान्मत्सुरै: सदा ।।१०२।।
In all these scriptures, the texts, which glorify the form of Bhagwan Shri Krishna in the utmost manner as well as duty and righteousness; devotion and detachment shall be predominantly believed. The devotion of Bhgwan Shri Krishna along with duty and righteousness is the essence of all these scriptures. (101-102)
और इन सभी सच्छास्त्रों में जो वचन श्रीकृष्ण भगवान का स्वरुप, धर्म, भक्ति तथा वैराग्य इन चारों के अत्यन्त उत्कर्ष भाव को बताते हों ।।१०१।।
उन वचनों को अन्य वचनों की अपेक्षा विशेषरुप से मानेंऔर श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति धर्मपूर्वक ही करें ऐसा उन सभी सच्छास्त्रों का रहस्य है ।।१०२।।
धर्मो ज्ञेय: सदाचार: श्रुतिस्मृत्युपपादित: ।
माहात्म्यज्ञानयुग्भूरिस्नेहो भक्तिश्च माधवे ।।१०३।।
Duty and righteousness (Dharma) means the ethical code prescribed by Shrutis (Vedas) and Smrutis (like Manusmriti, Yagnyavalkya Smriti etc.). Devotion (Bhakti) means the profound love for Bhagwan Shri Krishna accompanied by the knowledge of His glory. (103)
श्रुति एवं स्मृति द्वारा प्रतिपादित सदाचार को धर्म समझें तथा श्रीकृष्ण भगवान के प्रति माहात्म्य ज्ञान से युक्त अपार स्नेह को भक्ति समझें ।।१०३।।
वैराग्यं ज्ञेयमप्रीति: श्रीकृष्णेतरवस्तुषु ।
ज्ञानं च जीवमायेशरू पाणां सुष्ठु वेदनम् ।।१०४।।
Detachment (Vairagya) means nonattachment to everything except Bhagwan Shri Krishna. Knowledge (Gyan) means the comprehensive knowledge of the nature and form of the Jiva (Soul), Maya (illusion) and Ishwar(God). (104)
और श्रीकृष्ण भगवान के बिना अन्य पदार्थों में प्रीति न हो इसे वैराग्य समझें तथा जीव, माया और ईश्वर के स्वरुप को भलीभाँति जानना इसे ज्ञान समझें ।।१०४।।
हृत्स्थोऽणुसूक्ष्मश्चिद्रूपो ज्ञाता व्याप्याखिलां तनुम् ।
ज्ञानशक्त्या स्थितो जीवोज्ञेयोऽच्छेद्यादिलक्षण: ।।१०५।।
The Jiva (Soul) resides in the heart. He is subtle and minute as an atom and is living being and knower. He pervades the entire body from top to toe by his power of knowledge. He should be known as indivisible, impenetrable, non-waning and eternal. (105)
अब जीवका लक्षण बताते हैं, जो जीव है, वह हृदय में रहा है, अणु समान अत्यन्त सूक्ष्म है, चैतन्यस्वरुप है, ज्ञाता है, अपनी ज्ञान शक्ति द्वारा नख से शिखापर्यन्त अपने समस्त शरीर में व्याप्त है तथा अछेद्य, अभेद्य, अजर, अमर इत्यादि लक्षणों से युक्त है, इस प्रकार जीव को समझें ।।१०५।।
त्रिगुणात्मा तम: कृष्णशक्तिर्देहतदीययो: ।
जीवस्य चाहं ममताहेतुर्मायावगम्यताम् ।।१०६।।
Maya (illusion) consists of three qualities (i.e. Sattva, Rajas and Tamas) and she is in the form of darkness. She is the power of Bhgwan Shri Krishna and cause for creating ego and attachment in soul towards body and his relatives. (106)
और जो माया है, वह त्रिगुणात्मिका है, अन्धकार स्वरुप है, श्रीकृष्ण भगवान की शक्ति है तथा जीव को देह और देह के जो संबंधी में अहं ममत्व उत्पन्न करानेवाली है। इसप्रकार माया को समझें ।।१०६।।
हृदये जीववज्जीवे योऽन्तर्यामितया स्थित: ।
ज्ञेय: स्वतन्त्र ईशोऽसौ सर्वकर्मफलप्रद: ।।१०७।।
As Jiva resides in the heart, Ishwar resides in Jiva by virtue of His indwelling and controlling power. He is independent and sovereign. He is the dispenser of rewards to all living beings according to their actions (karmas). (107)
और जो ईश्वर हैं, वे जैसे जीव हृदय में रहा है, वैसे ही उस जीव में अन्तर्यामी रुप से रहै हैं और स्वतंत्र हैं तथा सर्व जीवों के कर्मफल प्रदाता हैं, इसप्रकार ईश्वरको समझें ।।१०७।।
स श्रीकृष्ण: परंब्रह्म भगवान् पुरुषोत्तम: ।
उपास्य इष्टदेवो न: सर्वाविर्भावकारणम् ।।१०८।।
That Ishwar is the Supreme Bhagwan Shri Krishna and He is our cherished God, worthy of worships for all of us and He is the source of all incarnations. (108)
और वे ईश्वर कौन ? तो परब्रह्म पुरुषोत्तम ऐसे जो श्रीकृष्ण भगवान हैं, वे ही ईश्वर हैं तथा वे श्रीकृष्ण हमारे इष्टदेव हैं और उपासना करने योग्य हैं और सर्व अवतारों के कारण हैं ।।१०८।।
स राधया युतो ज्ञेयो राधाकृष्ण इति प्रभु: ।
रुक्मिण्या रमयोपेतो लक्ष्मीनारायण: स हि ।।१०९।।
When that almighty Bhagwan Shri Krishna is associated with Radha the form should be known as Radha-Krishna and when He is associated with Lakshmiji (in a form of Rukmini) the form should be known as Lakshmi-Narayan. (109)
समर्थ ऐसे वे श्रीकृष्ण भगवान जब राधिकाजी के साथ हों तब ‘राधाकृष्ण’ कहलाते हैं तथा वे जब रुक्मिणी स्वरुप लक्ष्मीजी से युक्त हों तब ‘लक्ष्मीनारायण’ कहलाते हैं ।।१०९।।
ज्ञेयोऽर्जुनेन युक्तोऽसौ नरनारायणाभिध: ।
बलभद्रादियोगेन तत्तन्नामोच्यते स च ।।११०।।
When Bhagwan Shri Krishna is associated with Arjuna, the form should be known as Nar-Narayan and when He is with Balabhadra and other devotees, His form should be known as likewise names. (110)
और वे जो श्रीकृष्ण जब अर्जुन से युक्त हों तब उन्हें ‘नरनारायण’ नाम से जानना और वे जो श्रीकृष्ण जब बलभद्रादि के साथ हों तब उन उन नामों से कहे जाते हैं ऐसा जानना ।।११०।।
एते राधादयो भक्तास्तस्य स्यु: पार्श्वत: क्वचित् ।
क्वचित्तदङ्गेऽतिस्नेहात्स तु ज्ञेयस्तदैकल: ।।१११।।
Some times Radha and other devotees remain by the side of Bhagwan Shri Krishna and some times when, with intense love, they become absorbed in Him, Bhagwan Shri Krishna should be known as one and alone. (111)
और वे राधादि भक्त कभी तो श्रीकृष्ण भगवान के पार्श्व में रहते हैं और कभी अत्यन्त स्नेह से श्रीकृष्ण भगवान के अंग में लीन रहते हैं तब तो श्रीकृष्ण भगवान को अकेले ही समझना ।।१११।।
अतश्चास्य स्वरुपेषु भेदो ज्ञेयो न सर्वथा ।
चतुरादिभुजत्वं तु द्विबाहोस्तस्य चैच्छिकम् ।।११२।।
Therefore, no discrimination shall be made between various forms of Bhagwan Shri Krishna who is always with two arms but assumes different forms such as with four arms, with eight arms or with thousand arms at His own will. (112)
अतएव श्रीकृष्ण भगवान के स्वरुपों में किसी भी प्रकार का भेद न समझें और चतुर्भुज, अष्टभुज, सहस्रभुज इत्यादि जो भेद मालूम पडते हैं, वे तो द्विभुज ऐसे श्रीकृष्ण की इच्छा से ही हैं, ऐसा समझें ।।११२।।
तस्यैव सर्वथा भक्ति: कर्तव्या मनुजैर्भुवि ।
नि:श्रेयसकरं किञ्चित्ततोऽन्यन्नेति दृश्यताम् ।।११३।।
All human beings on this earth shall always worship Bhagwan Shri Krishna knowing that there is no other way for the ultimate salvation except devotion (Bhakti) of Him. (113)
ऐसे जो श्रीकृष्ण भगवान उनकी भक्ति, पृथ्वी पर के सभी मनुष्य करें और उस भक्ति से अधिक कल्याणकारी कोई अन्य साधन नहीं है ऐसा जानें ।।११३।।
गुणिनां गुणवत्ताया ज्ञेयं ह्येतत् परं फलम् ।
कृष्णे भक्तिश्च सत्सङ्गोऽन्यथा यान्ति विदोऽप्यध: ।।११४।।
Devotion of Bhagwan Shri Krishna and association (satsang) with saints shall be considered as supreme achievement of virtues of the learned because without devotion and satsang even learned is bound to degenerate.(114)
और श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति तथा सत्संग करना यही विद्यादि गुणों से युक्त पुरुषों के गुणों का परम फल है, अन्यथा भक्ति तथा सत्संग इन दोनों के बिना तो विद्वान भी अधोगति को प्राप्त करता है ।।११४।।
कृष्णस्तदवताराश्च ध्येयास्तत्प्रतिमाऽपि च ।
न तु जीवा नृदेवाद्या भक्ता ब्रह्मविदोऽपि च ।।११५।।
Only Bhagwan Shri Krishna, His incarnations and His idols are worthy of being meditated upon. A human being or a deity even though he may be a devotee of Bhagwan Shri Krishna or knower of ‘ Brahman’ is not worthy of being meditated upon and (therefore) he should not be meditated upon. (115)
श्रीकृष्ण भगवान तथा उनके अवतार ध्यान करने योग्य हैं तथा उनकी प्रतिमा भी ध्यान करने योग्य हैं अत: उनका ध्यान करें; परंतु मनुष्य तथा देवादि जो जीव वे तो श्रीकृष्ण भगवान के भक्त हों तथा ब्रह्मवेत्ता हों तो भी ध्यान करने योग्य नहीं है। अत: उनका ध्यान न करें ।।११५।।
निजात्मानं ब्रह्मरू पं देहत्रयविलक्षणम् ।
विभाव्य तेन कर्तव्या भक्ति: कृष्णस्य सर्वदा ।।११६।।
One shall first consider oneself as distinctly different from the three bodies viz. Gross (Sthul) subtle (Shukshma) and causal (Karan) then shall identify oneself with Brahman and then with that sublime form shall always offer devotion to Bhagwan Shri Krishna. (116)
स्थूल, सूक्ष्म और कारण इन तीन देहों से विलक्षण ऐसी जो अपनी जीवात्मा को ब्रह्मरुप की भावना कर ब्रह्मरुप से श्रीकृष्ण भगवान की भक्ति निरन्तर करें ।।११६।।
श्रव्य: श्रीमद्भागवतदशमस्कन्ध आदरात् ।
प्रत्यहं वा सकृद्वर्षे वर्षे वाच्योऽथ पण्डितै: ।।११७।।
My followers shall respectfully listen to the tenth skanda (canto) of Shrimad Bhagawat daily or at least once in a year. The scholars shall read it daily or at least once in a year. (117)
और श्रीमद् भागवत पुराण के दशमस्कंध को नित्य आदरपूर्वक सुनें अथवा प्रतिवर्ष एक बार सुनें और जो पंडित हों वे उसका प्रतिदिन पाठ करें अथवा प्रतिवर्ष एक बार पाठ करें ।।११७।।
कारणीया पुरश्चर्या पुण्यस्थानेऽस्य शक्तित: ।
विष्णुनामसहस्रादेश्चापि कार्येप्सितप्रदा ।।११८।।
My followers shall perform Purascharan (i.e. A number of specific Mantras and rituals are to be followed) of the tenth skanda (canto) of Shrimad Bhagawat or VishnuSahastranam himself or through others in a holy place as per their individual capacity. Such a Purascharan helps them to attain their desired fruits.(118)
और उस दशमस्कंध का पुरश्चरण अपनी शक्ति के अनुसार किसी पवित्र स्थान में करें, करावें तथा विष्णुसहस्र नाम आदि सच्छास्त्रों का पुरश्चरण भी अपनी शक्ति के अनुसार करें तथा करावें यह पुरश्चरण अपने मनोवांछित फलको देनेवाला है ।।११८।।
दैव्यामापदि कष्टायां मानुष्यां वा गदादिषु ।
यथा स्वपररक्षा स्यात्तथा वृत्त्यं न चान्यथा ।।११९।।
In the event of any calamity caused by nature or human being or sickness, My followers shall act in a way ensuring his own and others protection and not in any other way. (119)
कष्टदायक ऐसी दैव सम्बन्धी, मनुष्य सम्बन्धी तथा रोगादि सम्बन्धी कोई भी आपत्ति आ पडें, तो अपनी और अन्य की रक्षा हो वैसा आचरण करें, किन्तु अन्य रीति से आचरण न करें ।।११९।।
देशकालवयोवित्त जातिशक्त्यनुसारत: ।
आचारो व्यवहारश्च निष्कृतं चावधार्यताम् ।।१२०।।
The matters relating to customs, mutual dealings and expiation shall be decided in the context of one’s time, place, age, wealth, caste and capacity. (120)
आचार, व्यवहार एवं प्रायश्चित इन तीनों बातों को देश, काल, अवस्था, द्रव्य, जाति और शक्ति के अनुसार जानें ।।१२०।।
मतं विशिष्टाद्वैतं मे गोलोको धाम चेप्सितम् ।
तत्र ब्रह्मात्मना कृष्णसेवा मुक्तिश्च गम्यताम् ।।१२१।।
The qualified monotheism (Vishishtadvait) is My doctrine of philosophy and Golok is My cherished heavenly abode (Dham) and to serve Bhagwan Shri Krishna in Golok being in the state of Brahman is ultimate salvation. (Mukti) (121)
हमारा मत विशिष्टाद्वैत है, हमारा प्रिय धाम गोलोक है और उस धाम में ब्रह्मरुप से श्रीकृष्ण भगवान की सेवा करना उसीको हमने मुक्ति मानी है, ऐसा जानें ।।१२१।।
एते साधारणा धर्मा: पुंसां स्त्रीणां च सर्वत: ।
मदाश्रितानां कथिता विशेषानथ कीर्तये ।।१२२।।
The religious duties narrated above are common to be performed by all My male and female disciples and now I prescribe the special religious duties to be performed by My disciples of different classes separately. (122)
ये जो पूर्वोक्त सभी धर्म कहें-वे हमारे आश्रित, त्यागी तथा गृहस्थ स्त्री पुरुष सभी सत्संगीजनों के सामान्य धर्म हैं अर्थात् सभी सत्संगीजनों द्वारा समानरुप से पालनीय हैं और अब इन सभीके विशेष धर्मों को पृथक पृथक रुप से कहते हैं ।।१२२।।
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