Special Duties of Acharyas

Shlok 122

एते साधारणा धर्मा: पुंसां स्त्रीणां च सर्वत: ।
मदाश्रितानां कथिता विशेषानथ कीर्तये ।।१२२।।

Translation

The religious duties narrated above are common to be performed by all My male and female disciples and now I prescribe the special religious duties to be performed by My disciples of different classes separately. (122)

ये जो पूर्वोक्त सभी धर्म कहें-वे हमारे आश्रित, त्यागी तथा गृहस्थ स्त्री पुरुष सभी सत्संगीजनों के सामान्य धर्म हैं अर्थात्‌ सभी सत्संगीजनों द्वारा समानरुप से पालनीय हैं और अब इन सभीके विशेष धर्मों को पृथक पृथक रुप से कहते हैं ।।१२२।।

Shlok 123

मज्ज्येष्ठावरजभ्रातृसुताभ्यां तु कदाचन ।
स्वासन्नसम्बन्धहीना नोपदेश्या हि योषित: ।।१२३।।

Translation

(Now at first I specify the special duties to be performed by the Acharyas and their wives.) Ayodhyaprasad and Raghuvir, sons of My elder and younger brother respectively (Acharyas) shall never preach to females other than their nearest relatives. (123)

अब प्रथम धर्मवंशी आचार्य तथा उनकी पत्नियों के विशेष धर्म कहते हैं-हमारे बडे भाई तथा छोटे भाई के पुत्र (क्रमश:) जो अयोध्याप्रसादजी तथा रघुवीरजी हैं, वे अपने समीप सम्बन्ध रहित अन्य स्त्रियों को मंत्र उपदेश कदापि न करें ।।१२३।।

Shlok 124

न स्प्रष्टव्याश्च ता: क्वापि भाषणीयाश्च ता न हि ।
क्रौर्यं कार्यं न कस्मिंश्चिन्न्यासो रक्ष्यो न कस्यचित्‌ ।।१२४।।

Translation

They (Acharyas) shall never touch or talk to those women and shall not be cruel to any living being and shall not keep anybody’s deposit. (124).

और कभी उन स्त्रियों का स्पर्श न करें तथा न उनके साथ बात करें तथा किसी जीव पर क्रूरता न करें और किसी की धरोहर (थाती) कदापि न रखें ।।१२४।।

Shlok 125

प्रतिभूत्वं न कस्यापि कार्यं च व्यावहारिके ।
भिक्षयापदतिक्रम्या न तु कार्यमृणं क्वचित्‌ ।।१२५।।

Translation

They shall neverstand assurety for others in social matters or dealings. In the times of exigency or distress, they shall maintain themselves on alms but shall never incur debt. (125)

व्यवहार कार्य में किसी की भी जामिनी न करें तथा कोई आपत्काल आ पडे तो भिक्षा माँगकर अपना जीवन निर्वाह करके आपत्काल पार करें; परन्तु किसी का कर्ज तो कदापि न करें ।।१२५।।

Shlok 126

स्वशिष्यार्पितधान्यस्य कर्तव्यो विक्रयो न च ।
जीर्णं दत्त्वा नवीनं तु ग्राह्यं तन्नैष विक्रय: ।।१२६।।

Translation

They shall not sell grains offered to them by disciples. However the old grains may be exchanged for new. Such an exchange is not considered as a sale. (126)

अपने शिष्यों ने धर्म के निमित्त से जो अन्न दिया हो उसको बेचे नहीं। यदि वह अन्न पुराना हो जाय तो पुराना किसी को देकर नया लें। इसप्रकार पुराना किसी को देकर नया लेना यह विक्रय नहीं माना जाता ।।१२६।।

Shlok 127

भाद्रशुक्लचतुर्थ्यां च कार्यं विघ्नेशपूजनम्‌ ।
इषकृष्णचतुर्दश्यां कार्याऽर्चा च हनूमत: ।।१२७।।

Translation

They shall perform worship of Ganapati on the fourth day of the bright half of the month of Bhadrapad and that of Hanuman on the fourteenth day of dark half of the month of Ashwin. (127)

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन गणपति की पूजा करें तथा आश्विन कृष्ण चतुर्दशी के दिन हनुमानजी की पूजा करें ।।१२७।।

Shlok 128

मदाश्रितानां सर्वेषां धर्मरक्षणहेतवे ।
गुुरुत्वे स्थापिताभ्यां च ताभ्यां दीक्ष्या मुमुक्षव: ।।१२८।।

Translation

To protect the duty and righteousness of all My disciples, I have appointed the Acharyas viz. Ayodhyaprasad and Raghuvir as their religious heads and they shall initiate male aspirants. (128)

हमारे आश्रित सभी सत्संगीजनों के धर्म की रक्षा के लिए उन सभी के आचार्य पद पर हमारे द्वारा स्थापित जो दोनों आचार्य अयोध्याप्रसादजी तथा रघुवीरजी वे मुमुक्षुजनों को (भागवती) दीक्षा दें ।।१२८।।

Shlok 129

यथाधिकारं संस्थाप्या: स्वे स्वे धर्मे निजाश्रिता: ।
मान्या: सन्तश्च कर्तव्य: सच्छाशास्त्राभ्यास आदरात्‌ ।।१२९।।

Translation

They (Acharyas) shall see that all classes of their followers conform to their respective tenets of the sect. They shall respect the saints and shall study the holy scriptures with due respect. (129)

और अपने आश्रित सभी सत्संगीजनों को अधिकर अनुसार अपने अपने धर्म में रखें और साधुओं को आदरपूर्वक मानें तथा सच्छास्त्र का अध्ययन आदरपूर्वक करें ।।१२९।।

Shlok 130

मया प्रतिष्ठापितानां मन्दिरेषु महत्सु च ।
लक्ष्मीनारायणादीनां सेवा कार्या यथाविधि ।।१३०।।

Translation

They shall perform worship of Shri LakshmiNarayan and other forms of Shri Krishna installed by Me in big temples, with due rituals. (130)

हमारे द्वारा बडे बडे मंदिरो में संस्थापित श्री लक्ष्मीनारायणादि श्रीकृष्ण के स्वरुपों की सेवा यथाविधि करें ।।१३०।।

Shlok 131

भगवन्मन्दिरं प्राप्तो योऽन्नार्थी कोऽपि मानव: ।
आदरात्स तु सम्भाव्यो दानेनान्नस्य शक्तित: ।।१३१।।

Translation

Any human being who comes to the temple with a desire to have food shall be respectfully served with food according to availability and ability. (131)

और भगवान के मंदिर में आये हुए किसी भी अन्नार्थी ऐसे हरएक मनुष्य की अपनी शक्ति के अनुसार अन्नदान द्वारा आदरपूर्वक संभावना करें ।।१३१।।

Shloka 132

संस्थाप्य विप्रं विद्वांसं पाठशालां विधाप्य च ।
प्रवर्तनीया सद्‌विद्या भुवि यत्सुकृतं महत्‌ ।।१३२।।

Translation

They shall establish a school to educate the students and shall appoint a learned Brahmin therein to spread true education (Sadvidya) on the earth, as giving true education is an act of great benefit to all. (132)

और विद्याध्ययन के लिए पाठशाला स्थापित करके उसमें विद्वान ब्राह्मण को रखकर पृथ्वी पर सद्‌विद्या का प्रवर्तन करावें क्योंकि विद्यादान से महान पुण्य होता है ।।१३२।।