इति संक्षेपतो धर्मा:सर्वेषां लिखिता मया ।
साम्प्रदायिकग्रन्थेभ्यो ज्ञेय एषां तु विस्तर: ।।२०३।।
Thus I have described in brief, the general and special duties of all My follower males and females. Further details can be known from the scriptures of our sect. (203)
इसप्रकार हमने अपने आश्रित सत्संगी स्त्री पुरुष सभी के सामान्य धर्म तथा विशेष धर्म संक्षेप से लिखे हैं; इन धर्मों का विस्तार हमारे सम्प्रदाय के अन्य ग्रंथों द्वारा जानें ।।२०३।।
सच्छास्त्राणां समुद्धृत्य सर्वेषां सारमात्मना ।
पत्रीयं लिखिता नृणामभीष्टफलदायिनी ।।२०४।।
I have written this Shikshapatri by incorporating therein the essence of all the sacred scriptures, which fulfills wishes of every human being. (204)
और हमने अपनी बुद्धि से सभी सच्छास्त्रों का सारांश निकाल कर यह शिक्षापत्री लिखी है, वह कैसी है तो मनुष्य मात्र को अभीष्ट मनोवांछित फल देनेवाली है ।।२०४।।
इमामेव ततो नित्यमनुसृत्य ममाश्रितै: ।
यतात्मभिर्वर्तितव्यं न तु स्वैरं कदाचन ।।२०५।।
Therefore all My disciples shall always vigilantly act according to this Shikshapatri and shall never act according to their own whims. (205)
इसलिए हमारे आश्रित, सभी सत्संगी सावधानी से निरंतर इस शिक्षापत्री के अनुसार ही आचरण करें(बर्ते); परन्तु अपनी इच्छानुसार कदापि आचरण न करें ।।२०५।।
वर्तिष्यन्ते य इत्थं हि पुरुषा योषितस्तथा ।
ते धर्मादि चतुर्वर्गसिद्धिं प्राप्स्यन्ति निश्चितम् ।।२०६।।
My male and female disciples who will strictly act according to this Shikshapatri will surely achieve all the four goals of life i.e. Dharma, Artha, Kama and Moksha. (206)
और हमारे आश्रित, जो पुरुष व स्त्रियाँ इस शिक्षापत्री के अनुसार आचरण करेंगे (बर्तेंगे) वे निश्चय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि को प्राप्त करेंगे ।।२०६।।
नेत्थं य आचरिष्यन्ति ते त्वस्मत्सम्प्रदायत: ।
बहिर्भूता इति ज्ञेयं स्त्रीपुंसै: साम्प्रदायिकै: ।।२०७।।
The males and females disciples of My sect shall know that those who do not act according to this Shikshapatri shall be considered as excommunicated from this sect. (207)
और जो स्त्री पुरुष इस शिक्षापत्री के अनुसार आचरण नहीं करेंगे वे हमारे सम्प्रदाय से बाहर हैं, ऐसा हमारे सम्प्रदायवाले स्त्री-पुरुष समझें ।।२०७।।
शिक्षापत्र्या: प्रतिदिनं पाठोऽस्या मदुपाश्रितै: ।
कर्तव्योऽनक्षरज्ञैस्तु श्रवणं कार्यमादरात् ।।२०८।।
My followers shall daily read this Shikshapatri. Those, who are unable to read, shall listen to its reading with reverence. (208)
हमारे आश्रित सत्संगी इस शिक्षापत्री का प्रतिदिन पाठ करें और जो अनपढ हैं वे आदरपूर्वक इस शिक्षापत्री का श्रवण करें ।।२०८।।
वक्त्रभावे तु पूजैव कार्याऽस्या: प्रतिवासरम् ।
मद्रूपमिति मद्वाणी मान्येयं परमादरात् ।।२०९।।
When there is no one to read this Shikshapatri to them, they shall worship it daily with great reverence. All followers shall reverently honor My words as a personified form of My own divine self. (209)
और इस शिक्षापत्री को पढकर सुनाये ऐसा कोई न हो तब प्रतिदिन इस शिक्षापत्री की पूजा करें और यह हमारी वाणी वह हमारा स्वरुप है, ऐसा समझकर इसे परम आदरपूर्वक मानें ।।२०९।।
युक्ताय सम्पदा दैव्या दातव्येयं तु पत्रिका ।
आसुर्या सम्पदाढ्याय पुंसे देया न कर्हिचित् ।।२१०।।
This Shikshapatri shall only be given to a person having divine virtues and shall never be given to a person having wicked tendencies. (210)
हमारी इस शिक्षापत्री को दैवी संपत्ति से युक्त मनुष्य को ही दें, किन्तु आसुरी संपत्ति से युक्त मनुष्य को कदापि न दें ।।२१०।।
विक्रमार्कशकस्याब्दे नेत्राष्टावसुभूमिते ।
वसन्ताद्यादिने शिक्षापत्रीयं लिखिता शुभा ।।२११।।
I have written this Shikshapatri on the fifth day of the bright half of the month of Maha (i.e. Vasant Panchami) of the Vikram Samvat 1882 (1826 A. D.) and it is the bestower of the highest bliss. (211)
संवत् १८८२ अठारह सौ बयासी के माघ शुक्ल पंचमी (वसन्त पंचमी) के दिन हमने यह शिक्षापत्री लिखी है, वह परम कल्याणकारी है ।।२११।।
निजाश्रितानां सकलार्तिहन्ता सधर्मभक्तेरवनं विधाता ।
दाता सुखानां मनसेप्सितानां तनोतु कृष्णोऽखिल मङ्गलं न: ।।२१२।।
Bhagwan Shri Krishna, the destroyer of all the miseries of His devotees, the defender of devotion (Bhakti) with duty and righteousness (Dharma) and bestower of desired happiness to their devotees may extensively spread my total welfare. (212)
अपने आश्रित भक्तजनों की समग्र पीडा को नाश करनेवाले, धर्म सहित भक्ति की रक्षा करनेवाले और अपने भक्तजनों को मनोवांछित सुख देनेवाले भगवान श्रीकृष्ण हमारे समग्र मंगल का विस्तार करें ।।२१२।।
|| इति श्री सहजानंद स्वामी के शिष्य नित्यानंद मुनि लिखित शिक्षापत्री की टीका हिन्दी अनुवाद सहित समाप्त ||