Introduction Shlok

Shlok 01

वामे यस्य स्थित राधा श्रीश्च यस्यास्ति वक्षसि।
वृन्दावनविहारं तं श्रीकृष्णं हृदि चिन्तये ॥1॥

Translation

I meditate in My heart on Bhagawan Shri Krishna, with Radha on His left and Lakshmi residing in His bosom and who pleasantly plays in Vrindavan. (1)

अपने सत्संगीजनों के प्रति शिक्षापत्री लिखते हुए भगवान श्री सहजानंद स्वामी, प्रथम अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण भगवान का ध्यान रुप मंगलाचरण करते हैं-

जिनके वामभाग में राधिकाजी विराजमान हैं और जिनके वक्ष: स्थल में लक्ष्मीजी विद्यमान हैं तथा जो वृन्दावन विहारी हैं, ऐसे भगवान श्रीकृष्ण का हम अपने हृदय में ध्यान करते हैं ।।१।।

Shlok 02

लिखामि सहजानन्द स्वामी सर्वान्निजाश्रितान्‌
नानादेशस्थितान् शिक्षापत्रीं वृत्तालयस्थितः ॥2॥

Translation

I, Sahajanand Swami, staying at Vrittalay (Vadtal) write this Shikshapatri to My followers living far and wide in various regions. (2)

वडताल गाँव में रहे हुए हम (सहजानन्द स्वामी) विभिन्न देशों में निवास करनेवाले हमारे आश्रित सभी सत्संगीजनों के प्रति शिक्षापत्री लिखते हैं ।।२।।

Shlok 03

भ्रात्रो रामप्रतापेच्छारामयोर्धर्मजन्मनो: । यावयोध्याप्रसादाख्यरघुवीराभिधौ सुतौ ।।३।।

Translation

Ayodhyaprasad and Raghuvir respectively the sons of My brothers Rampratapji and Ichharamji born of Shri Dharmdev, (who have been adopted by Me and appointed by Me as Acharyas(the heads) of My followers), (3)

(हमारे पिता) श्री धर्मदेव से हैं जन्म जिनका, ऐसे जो हमारे भाई रामप्रतापजी तथा इच्छारामजी, उनके पुत्र अयोध्याप्रसादजी तथा रघुवीरजी (जिन्हें हमने अपने दत्तक पुत्र मानकर सभी सत्संगीजनों के आचार्य पद पर स्थापित किये हैं।) ।।३।।

Shlok 04

मुकुन्दानन्दमुख्याश्च नैष्ठिका ब्रह्मचारिण: ।
गृहस्थाश्च मयारामभट्टाद्या ये मदाश्रया: ।।४।।

Translation

My devoted celibate followers such as Mukundanand and others, householders Shri Mayaram Bhatt and others, (4)

तथा हमारे आश्रित जो मुकुंदानन्दजी आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी एवं हमारे आश्रित मयाराम भट्ट आदि जो गृहस्थ सत्संगी ।।४।।

Shlok 05

सधवा विधवा योषा याश्च मच्छिष्यतां गता: ।
मुक्तानन्दादयो ये स्यु: साधवश्चाखिला अपि ।।५।।

Translation

My followers, married women and widows, Shri Muktanand and other saints, (5)

तथा हमारे आश्रित जो सधवा तथा विधवा स्त्रियाँ तथा मुक्तानन्दजी आदि सर्व साधुजन ।।५।।

Shlok 06

स्वधर्मरक्षिका मे तै: सर्वैर्वाच्या: सदाशिष: ।
श्रीमन्नारायणस्मृत्या सहिता: शास्त्रसम्मता: ।।६।।

Translation

Let them all accept My auspicious blessings with remembrance of Shri NarNarayan, who is the defender of faith, and authenticated by the scriptures. (6)

वे सभी, अपने धर्म की रक्षा करनेवाले, शास्त्रसम्मत एवं श्रीमन्नारायणकी स्मृति सहित हमारे आशीर्वाद बाँचे ।।६।।

Shlok 07

एकाग्रेणैव मनसा पत्रीलेख: सहेतुक: ।
अवधार्योऽयमखिलै: सर्वजीवहितावह: ।।७।।

Translation

They shall all ponder with due attention, the purpose of Me writing this Shikshapatri, which is the welfare of all the living beings. (7)

और इस शिक्षापत्री लिखने का जो उद्देश्य है, उसको सर्व एकाग्र मन से धारण करें। यह शिक्षापत्री जो हमने लिखी है, वह सर्व जीवों का हित करनेवाली है ।।७।।

Shlok 08

ये पालयन्ति मनुजा: सच्छास्त्रप्रतिपादितान्‌ ।
सदाचारान्‌ सदा तेऽत्र परत्र च महासुखा: ।।८।।

Translation

The human beings who practice the ethics like non-violence preached by Shrimad Bhagawat Puran and other scriptures, shall attain great happiness in this world and in the other world (after death). (8)

श्रीमद्‌ भागवत पुराण आदि सत्शास्त्रों द्वारा जीवों के कल्याण के लिए प्रतिपादित अहिंसा आदि सदाचारों का जो लोग पालन करते हैं, वे इस लोक में तथा परलोक में उत्तम सुख को प्राप्त करते हैं ।।८।

Shlok 09

तानुल्लङ्घयात्र वर्तन्ते ये तु स्वैरं कुबुद्धय: ।
त इहामुत्र च महल्लभन्ते कष्टमेव हि ।।९।।

Translation

who willfully Shikshapatri violate these codes of conduct and live according to their own whims, are of evil intellect indeed and will definitely receive great sufferings in this world and in the other world (after death). (9)

और उन सदाचारों का उल्लंघन करके जो मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं, वे कुबुद्धिवाले हैं और इस लोक में तथा परलोक में निश्चय ही वडे कष्टको प्राप्त करते हैं ।।९।।

Shlok 10

अतो भवद्‌भिर्मच्छिष्यै: सावधानतयाऽखिलै: ।
प्रीत्यैतामनुसृत्यैव वर्तितव्यं निरन्तरम्‌ ।।१०।।

Translation

Therefore, all My disciples shall always follow carefully and lovingly, the rules of this Shikshapatri and never disobey them. (10)

इसलिए हमारे शिष्य, ऐसे आप लोग, प्रीतिपूर्वक इस शिक्षापत्री के अनुसार ही निरंतर सावधान होकर आचरण करें;परंतु इस शिक्षापत्री का उल्लंघन कदापि न करें ।।१०।।