नैष्ठिकव्रतवन्तो ये वर्णिनो मदुपाश्रया: ।
तै: स्पृश्या न स्त्रियो भाष्या न च वीक्ष्याश्च ता धिया ।।१७५।।
Now I narrate the special duties of ‘Naisthik Brahmcharis’ (total celibates) My disciples who are Naishthik Brahmcharis (total celibates) shall neither touch nor talk to any woman. They shall not look at women intentionally. (175)
अब नैष्ठिक ब्रह्मचारियों के विशेष धर्म कहते हैं-हमारे आश्रित नैष्ठिक ब्रह्मचारी स्त्रीमात्र का स्पर्श न करें और स्त्री के साथ बोले नहीं एवं जानबूझकर स्त्रीकी और देखें नहीं ।।१७५।।
तासां वार्ता न कर्तव्या न श्रव्याश्च कदाचन ।
तत्पादचारस्थानेषु न च स्नानादिका क्रिया: ।।१७६।।
They shall never talk to or listen about women. They shall not go for bathing etc. at such places where females are frequenting. (176)
और उन स्त्रियों के बारे में कदापि चर्चा न करें और न सुनें तथा जिस स्थान में स्त्रियों का पद-संचार हों उस स्थान में स्नानादि क्रिया करने के लिए भी न जायें ।।१७६।।
देवताप्रतिमां हित्वा लेख्या काष्ठादिजापि वा ।
न योषित्प्रतिमा स्पृश्या न वीक्ष्याबुद्धिपूर्वकम् ।।१७७।।
Except the image of Goddess, they shall not touch or look at intentionally the picture or idol of woman made of wood etc. (177)
देवता की प्रतिमा के बिना दूसरी स्त्री की प्रतिमा जो चित्रित या काष्ठादि से निर्मित हों तो भी उनका स्पर्श न करें और जान बूझकर उस प्रतिमा को देखें भी नहीं ।।१७७।।
न स्त्रीप्रतिकृति: कार्या न स्पृश्यं योषितोंऽशुकम् ।
न वीक्ष्यं मैथुनपरं प्राणिमात्रं च तैर्धिया ।।१७८।।
They shall neither draw picture of women nor shall they touch the clothes worn by a woman. They shall not look intentionally at animals in act of coition. (178)
और वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी, स्त्री की प्रतिमा की रचना कदापि न करें तथा स्त्री द्वारा अपने शरीर पर धारण किये गये वस्त्र का स्पर्श न करें और मैथुनासक्त पशुपक्षी आदि प्राणिमात्र को जान बूझकर न देखें ।।१७८।।
न स्पृश्यो नेक्षणीयश्च नारीवेषधर: पुमान् ।
न कार्यं स्त्री: समुद्दिश्य भगवद्गुणकीर्तनम् ।।१७९।।
They shall neither look at and talk to nor touch a man who is disguised as a female. They shall not give religious discourses and sing devotional songs directed at females. (179)
और स्त्री के वेश को धारण किये हुए पुरुष का स्पर्श न करें, उसकी ओर देखे भी नहीं । उसके साथ बोले भी नहीं और स्त्रियों को उद्देश (संबोधित) करके भगवान की कथा, वार्ता, कीर्तन आदि भी न करें ।।१७९।।
ब्रह्मचर्य व्रतत्यागपरं वाक्यं गुरोरपि ।
तैर्न मान्यं सदा स्थेयं धीरैस्तुष्टैरमानिभि: ।।१८०।।
They shall not obey the instructions, even if it is of their preceptors, which may lead them to a breach of their vow of celibacy. They shall always lead a patient, contented and humble life. (180)
और वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी, जिससे नैष्ठिक व्रत का भंग होता हो, ऐसा वचन अपने गुरु का हो तो भी उसको न मानें और निरंतर धैर्यवान रहें तथा संतोषयुक्त रहें एवं मानरहित रहें ।।१८०।।
स्वातिनैकट्यमायान्ती प्रसभं वनिता तु या ।
निवारणीया सा भाष्य तिरस्कृत्यापि वा द्रुतम् ।।१८१।।
They shall immediately stop any woman forcibly coming near to them, by talking or even by insulting her but in any case she should not be allowed to come near. (181)
बलात् अपने अत्यंत समीप आनेवाली स्त्री को बोलकर अथवा उसका तिरस्कार करके भी उसे निवारें; परंतु समीप कदापि न आने दें ।।१८१।।
प्राणापद्युपपन्नायां स्त्रीणां स्वेषां च वा क्वचित् ।
तदा स्पृष्ट्वापि तद्रक्षा कार्या सम्भाष्य ताश्च वा ।।१८२।।
In an exigency when their own life or that of women is in danger, they shall protect the life of women and of themselves by talking to them or even by touching them. (182)
और यदि कदाचित् स्त्रियों के अथवा अपने प्राण का नाश हों ऐसे आपत्काल के समय पर तो स्त्रियों का स्पर्श करके अथवा उनके साथ बोलकर भी उन स्त्रियों की रक्षा करें तथा अपनी भी रक्षा करें ।।१८२।।
तैलाभ्यङ्गो न कर्तव्यो न धार्यं चायुधं तथा ।
वेषो न विकृतो धार्यो जेतव्या रसना च तै: ।।१८३।।
They shall neither massage their bodies with oil nor shall they carry weapons. They shall not wear dreadful looking dress and shall overcome the taste of the tongue. (183)
वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी, अपने शरीर पर तेल मर्दन न करें तथा आयुध धारण न करें और भयंकर वेश भी धारण न करें तथा रसना इन्द्रिय को वश में करें ।।१८३।।
परिवेषणकर्त्री स्याद्यत्र स्त्री विप्रवेश्मनि ।
न गम्यं तत्र भिक्षार्थं गन्तव्यमितरत्र तु ।।१८४।।
They shall not go to the house of a Brahmin where the meals are served by a woman but shall go to such a house (of a Brahmin) where the server is a male. (184)
जिस ब्राह्मण के घर पर स्त्री परोसनेवाली हो उसके घर भिक्षा के लिए न जायें। जहाँ पुरुष परोसनेवाला हो वहाँ जायें ।।१८४।।
अभ्यासो वेदशास्त्राणां कार्यश्च गुरुसेवनम् ।
वर्ज्य: स्त्रीणामिव स्रैणपुंसां सङ्गश्च तै: सदा ।।१८५।।
They shall always study the Vedas and other scriptures and serve their preceptor. They shall always avoid the company of effeminate males just as the company of women. (185)
वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी, वेदशास्त्रों का अध्ययन करें तथा गुरु की सेवा करें और स्त्रियों के समान ही स्त्रैण पुरुषों के संग का भी सर्वदा त्याग करें ।।१८५।।
चर्मवारि न वै पेयं जात्या विप्रेण केनचित् ।
पलाण्डुलशुनाद्यं च तेन भक्ष्यं न सर्वथा ।।१८६।।
Those who are Brahmin by caste, shall never drink water passed through a leather bucket and they shall never eat non-eatables like onion, garlic etc. (186)
जाति से जो ब्राह्मण हैं वे चमडे के पात्र से निकाला हुआ पानी कदापि न पीयें तथा प्याज और लहसुन आदि अभक्ष्य चीजों का भोजन किसी भी प्रकार से न करें ।।१८६।।
स्नानं सन्ध्यां च गायत्रीजपं श्रीविष्णुपूजनम् ।
अकृत्वा वैश्वदेवं च कर्तव्यं नैव भोजनम् ।।१८७।।
And those who are Brahmins must not take meal without taking bath and without performing morning prayer (sandhya), chanting of ‘Gayatri Mantra’, Worship (puja) of Shri Vishnu and food offering (Vaisvadev). (187)
जो ब्राह्मण हों वे स्नान, संध्या, गायत्री का जप, श्रीविष्णु की पूजा तथा वैश्वदेव, इतना किये बिना भोजन कदापि न करें। (इस प्रकार नैष्ठिक ब्रह्मचारी के धर्म कहे गये) ।।१८७।।
साधवो येऽथ तै: सर्वै र्नैष्ठिकब्रह्मचारिवत् ।
स्त्रीस्त्रैणसङगादि वर्ज्यं जेतव्याश्चान्तरारय: ।।१८८।।
Like my total celibate disciples, my saints shall not talk to or look at women and effeminate males. They shall conquer internal enemies like lust, anger, greed and ego etc. (188)
अब साधु के विशेष धर्म कहते हैं—हमारे आश्रित सभी साधु, नैष्ठिक ब्रह्मचारी की भाँति ही स्त्रियों के दर्शन भाषण आदि प्रसंग का त्याग करें तथा स्त्रैण पुरुष के प्रसंगादि का त्याग करें और काम, क्रोध, लोभ एवं मान इत्यादि अंत:शत्रुओं को जीतें ।।१८८।।
सर्वेन्द्रियाणि जेयानि रसना तु विशेषत: ।
न द्रव्यसङग्रह: कार्य: कारणीयो न केनचित् ।।१८९।।
They shall overcome all the senses, more particularly the sense of taste. They shall not accumulate money (wealth) themselves nor shall make others do so on their behalf. (189)
और वे सभी इन्द्रियों को वश में करें तथा और रसना इन्द्रिय को तो विशेष रूप से वश में करें। द्रव्य का संग्रह न तो स्वयं करें न अन्य के पास करावें ।।१८९।।
न्यासो रक्ष्यो न कस्यापि धैर्यं त्याज्यं न कर्हिचित् ।
न प्रवेशयितव्या च स्वावासे स्त्री कदाचन ।।१९०।।
They shall not keep anybody’s deposits. They shall never lose patience. They shall not allow any woman to enter into their residential place. (190)
किसी की भी धरोहर (थाती) न रखें और कदापि धैर्य का त्याग न करें और अपने आवास-स्थान में स्त्री का प्रवेश कदापि न होने दें ।।१९०।।
न च सङधं विना रात्रौ चलितव्यमनापदि ।
एकाकिभिर्न गन्तव्यं तथा क्वापि विनापदम् ।।१९१।।
Except in emergency, my saints shall never go out alone without companion during the night time. They shall never go out alone unaccompanied by other saints except in emergency.
वे साधु, आपत्काल के विना रात्रि के समय संग सौबत के बिना कदापि न चलें और आपत्काल के बिना कदापि अकेले न चलें ।।१९१।।
अनर्घ्यं चित्रितं वास: कुसुम्भाद्यैश्च रञ्जितम् ।
न धार्यं च महावस्त्रं प्राप्तमन्येच्छयापि तत् ।।१९२।।
They shall not wear clothes, which are costly, gaudily dyed and printed in variegated designs. They shall not put on precious shawls or other garments, even if they are willingly offered to them by others.
जो वस्त्र बहुमूल्यवान हो, चित्र विचित्र भातवाला हो तथा कसुंबी आदि रंगों से रंगा हुआ हो तथा शाल दुशाला हो और अगर वह अन्य की इच्छा से अपने को प्राप्त हुआ हो तो भी उसको धारण न करें ।।१९२।।
भिक्षां सभां विना नैव गन्तव्यं गृहिणो गृहम् ।
व्यर्थ: कालो न नेतव्यो भक्तिं भगवतो विना ।।१९३।।
They shall not go to the residence of any householder except for alms (food) or for religious assembly. They shall not pass their time in vain without nine types of devotion of God but shall always pass their time in devotion.
भिक्षा तथा सभाप्रसंग, इन दो कार्यों के सिवा गृहस्थ के घर पर न जायें और भगवान की नव प्रकार की भक्ति के बिना व्यर्थ काल न बितावें; निरंतर भक्ति करके ही समय व्यतीत करें ।।१९३।।
पुमानेव भवेद्यत्र पक्वान्नपरिवेषण: ।
ईक्षणादि भवेन्नैव यत्र स्त्रीणां च सर्वथा ।।१९४।।
तत्र गृहिगृहे भोक्तुं गन्तव्यं साधुभिर्मम ।
अन्यथामान्नमर्थित्वा पाक: कार्य: स्वयं च तै: ।।१९५।।
My saints shall go to the residence of such householders for meals where food is being served by males only and females are totally out of sight, otherwise they shall beg for uncooked/raw food and cook themselves and shall offer it to the God before consuming it.
और जिस गृहस्थ के घर पर पकाये हुए अन्न का परोसनेवाला पुरुष ही हो तथा स्त्रियों के दर्शनादि का प्रसंग किसी भी प्रकार से न हो ।।१९४।।
ऐसे गृहस्थ के घर पर हमारे साधु, भोजन के लिए जायें और उपर कहे अनुसार यदि न हो तो कच्चा अन्न माँगकर अपने हाथ से रसोई बनाकर भगवान को नैवेद्य अर्पण करके भोजन करें ।।१९५।।
आर्षभो भरत: पूर्वं जडविप्रो यथा भुवि ।
अवर्ततात्र परमहंसैर्वृत्यं तथैव तै: ।।१९६।।
In the ancient times, Bharatji, son of Rishabhdev lived and behaved on earth like a detached insensate Brahmin. All my Paramhansa and Sadhus shall also behave similarly.
पूर्वकाल में ऋषभदेव भगवान के पुत्र भरतजी जिस प्रकार पृथ्वी पर जड बाह्मण के समान आचरण करते थे ठीक उसी प्रकार परमहंस ऐसे जो हमारे साधु वे आचरण करें ।।१९६।।
वर्णिभि: साधुभिश्चैतैर्वर्जनीयं प्रयत्नत: ।
ताम्बूलस्याहिफेनस्य तमालादेश्च भक्षणम् ।।१९७।।
The total and absolute celibates and saints shall diligently abstain from taking betel leaves, opium, tobacco and other similar intoxicating substances.
वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी एवं साधु-ताम्बुल, अफीम तथा तम्बाकू इत्यादि के भक्षण का प्रयत्नपूर्वक त्याग करें ।।१९७।।
संस्कारेषु न भोक्तव्यं गर्भाधानमुखेषु तै: ।
प्रेतश्राद्धेषु सर्वेषु श्राद्धे च द्वादशाहिके ।।१९८।।
The total and absolute celibates and saints shall never dine at ceremonies pertaining to conception etc. or during the performance of obituary rites (pret-shradhdha) up to the eleventh and twelfth day after the death of a person.
और वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी एवं साधु, गर्भाधान आदि संस्कार प्रसंग पर भोजन न करें तथा एकादशाहपर्यन्त जो प्रेत श्राद्ध उसके प्रसंग पर तथा द्वादशाह श्राद्ध में भी भोजन न करें ।।१९८।।
दिवास्वापो न कर्तव्यो रोगाद्यापदमन्तरा ।
ग्राम्यवार्ता न कार्या च न श्रव्या बुद्धिपूर्वकम् ।।१९९।।
They shall not sleep during the day except in the time of distress like illness. They shall neither indulge themselves deliberately in talking about worldly matters nor listening to them.
रोगादि आपतत्काल के बिना दिन मेें निद्रा न करेें और ग्राम्यवार्ता न करेें और जान-बूझकर सुने भी नहीं ।।१९९।।
स्वप्यं न तैश्च खट्वायां विना रोगादिमापदम् ।
निश्छद्म वर्तितव्यं च साधूनामग्रत: सदा ।।२००।।
They shall not sleep on a bed except when they are troubled by illness etc. They shall always behave frankly and open heartedly with saints.
और वे नैष्ठिक ब्रह्मचारी तथा साधु, रोगादि आपत्काल के बिना चारपाई पर कभी न सोयें और साधुओं के आगे निरंतर निष्कपट भाव से आचरण करें(बर्तें) ।।२००।।
गालिदानं ताडनं च कृतं कुमतिभिर्जनै: ।
क्षन्तव्यमेव सर्वेषां चिन्तनीयं हितं च तै: ।।२०१।।
They shall bear when they are abused or beaten by the wicked persons but shall never abuse or beat them in response, but shall instead, think of their well-being and shall not even think of their receiving bad results. (201)
उन साधु तथा ब्रह्मचारी को यदि कोई कुमतिवाले दुष्टजन गाली दें अथवा मारें तो भी उसे सहन ही करें; परन्तु उसके प्रतिकार में गाली न दें, मारे भी नहीं तथा जिसप्रकार उसका हित हो वैसा ही मन में चिंतन करें; परन्तु उसका बुरा हो ऐसा संकल्प भी न करें ।।२०१।।
दूतकर्म न कर्तव्यं पैशुनं चारकर्म च ।
देहेऽहन्ता च ममता न कार्या स्वजनादिषु ।।२०२।।
They shall neither act as anybody’s agent nor indulge in backbiting or spying. They shall forsake ego and attachment to their bodies as well as to their relatives etc. (Thus narrated the special duties of saints.) (202)
किसी का दूतकार्य न करें तथा चुगलखोरी भी न करें चारचक्षु न बनें (जासूसी न करें) तथा देह में अहंबुद्धि और स्वजन आदि में ममत्वबुद्धि न रखें (इसप्रकार साधु के विशेष धर्म कहे गये) ।।२०२।।