अथैतयोस्तु भार्याभ्यामाज्ञया पत्युरात्मन: ।
कृष्णमन्त्रोपदेशश्च कर्तव्य: स्त्रीभ्य एव हि ।।१३३।।
The wives of Achar yas, with the permission of their husbands, shall preach to women only and shall initiate them into the faith. (133).
अब अयोध्याप्रसादजी तथा रघुवीरजी, इन दोनों की जो पत्नियाँ हैं वे अपने पति की आज्ञा से स्त्रियों को ही श्रीकृष्ण के मंत्र का उपदेश करें; परन्तु पुरुष को मंत्र उपदेश न करें ।।१३३।।
स्वासन्नसम्बन्धहीना नरास्ताभ्यां तु कर्हिचित् ।
नस्प्रष्टव्या न भाष्याश्च तेभ्यो दर्श्यं मुखं न च ।।१३४।।
The wives of these two Acharyas shall never touch, talk or even show their faces to the males other than their closest relatives. (134)
उन दोनों की पत्नियाँ अपने समीप सम्बन्ध रहित पुरुषों का स्पर्श कदापि न करें और उसके साथ बात भी न करें तथा उन्हें अपना मुख भी न दिखायें (इस प्रकार धर्मवंशी आचार्य और उनकी पत्नियों के धर्म कहे गये) ।।१३४।।
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